बगावत का तमगा पीछे छोड़ आशा नौटियाल एक बार फिर केदारनाथ से टिकट की दौड़ में सबसे आगे पहुंच गई है। सूत्रों की माने तो पार्टी हाईकमान की उन पर सहमति बनती नजर आ रही है। संभवतः 26 जनवरी को पार्टी इसकी आधिकारिक घोषण कर सकती है।

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  उत्तराखण्ड बनने के बाद आशा नौटियाल केदारनाथ की पहली विधायक बनी। वर्ष 2007 में राज्य के दूसरे विधानसभा चुनाव में आशा नौटियाल ने 16971 वोट हासिल कर कांग्रेस प्रत्याशी कुंवर सिंह नेगी को 7597 वोटो से हरा दिया। वर्ष 2012 के तीसरे विधानसभा चुनाव में आशा नौटियाल कांग्रेस की प्रत्याशी शैलारानी रावत से 2328 वोटों से चुनाव हार गई। इस चुनाव में कांग्रेस की शैलारानी को कुल 19960 मत और आशा नौटियाल को 17632 मत प्राप्त हुए थे। इस वर्ष कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन सरकार के कार्यकाल खत्म होने से पहले ही कांग्रेस के 11 विधायकों ने बगावत कर हरीश रावत सरकार गिरा दी। इन 11 विधायकों में केदारनाथ विधायक शैलारानी रावत भी थी। 2017 में हुए आम चुनावों में इन सभी बागी 11 विधायकों ने भाजपा ने अपना टिकट दे दिया। फलस्वरूप केदारनाथ से आशा की जगह भाजपा ने शैलारानी को टिकट दे दिया। शैलारानी को टिकट देने से नाराज आशा नौटियाल ने बगावत कर चुनाव लड़ा, जिस कारण शैलारानी और आशा नौटियाल दोनो हार गए। इस बगावत का लाभ कांग्रेस प्रत्याशी मनोज रावत को हुआ जो 13906 मत लाकर पहले स्थान पर रहे जबकि दूसरे स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी कुलदीप रावत भाजपा की शैलारानी और निर्दलीय आशा नौटियाल से आगे आकर 13037 मत झटक लिए। भाजपा के लिए यह हार बेहद शर्मनाक थी। इस हार का पूरा श्रेय आशा की बगावत को गया। इस हार से खफा पार्टी ने आशा नौटियाल को भाजपा से निष्काशित कर दिया। लेकिन बाद में आशा फिर से भाजपा में शामिल हो गई। इस बार टिकट आवंटन के बाबत भाजपा के फायरब्रांड नेता रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की दखलअंदाजी  जी के बाबत सूत्रों की माने तो इस सीट पर टिकट मिलने के सबसे जादा आसार अब पूर्व विधायक आशा नौटियाल के हो गए है। आशा ‘निशंक’ की करीबी मानी जाती है, पूर्व में भी आशा को टिकट दिए जाने पर निशंक का ही वरदहस्त था। इस बार भी टिकट आवंटन में बड़ी संख्या में निशंक समर्थको को टिकट मिलने से आशा की सोई हुइ उम्मीदों को भी नया बल मिल गया।