भगवान शिव और पार्वती से केदारघाटी के स्नेह व संबंध की परंपरा ‘धनोळी’
1 min read
02/03/20226:27 am
कविता मैठाणी भट्ट / ऊखीमठ
केदारघाटी में देर सायं महाशिवरात्रि (शिव पार्वती का विवाह दिवस) पूजन पर घरों के बाहर पंय्यां की टहनियों और बुरांश के फूल से सजी धनोळी लगाई गई। साथ ही महादेव पार्वती के प्रतीकों को रात्रि भर पूजा गया। आज इन प्रतीकों को विधिवत पूजा के बाद विसर्जित कर दिया जाएगा।
भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती से केदारघाटी का गहरा लगाव और विशेष संबंध रहा है। यहां शिव पार्वती को ईश्वर कम और अपने परिवार का सदस्य अधिक समझा जाता है। बचपन से देखती आयी हूं कितने सहज, सरल ,भोलेपन से बाबा केदार , मध्यमहेश्वर ,तुंगनाथ से केदारघाटी वासी अपने दुख दर्द परेशानियां साझा करते हैं। शिकायत करते हैं । ये सब तो छोड़िये,डांटते भी हैं। महादेव पार्वती से केदारघाटी के इसी खूबसूरत संबंध को दर्शाती एक अनूठी परंपरा है धनोळी पूजन।
धनोळी लगाते हुए
महा शिवरात्रि (शिव पार्वती का विवाह दिवस) की शाम को सभी घरों में पंय्यां की टहनियों से एक डोली बनाकर इस पर बुरांश के फूल लगाये जाते हैं। इस डोली को ही धनोळी कहा जाता है। मिट्टी से शिव , पार्वती और गणेश बनाये जाते हैं। उन पर जौ के बीज चिपकाये जाते हैं । मरछा के लंय्यां और भूने हुए भट्ट , धूप दीप से मिट्टी से बनाये गये शिव, पार्वती ,गणेश और धनोळी की पूजा करके,सबकी सुख समृद्धि की कामना करते हुए धनोळी को घर के बाहर टांग दिया जाता है। सुबह इन तीनों लिंग स्वरूपों को धारे के मूलस्रोत( मुळ्याण) में विसर्जित किया जाता है।
भले ही पलायन की मार झेलते गांवों में अब बहुत कम लोग ही रह गये हैं किंतु भगवान शिव और पार्वती से केदारघाटी के स्नेह व संबंध को दर्शाती यह परंपरा आज भी गांवों में जीवित है।
कविता मैठाणी भट्ट (कवियित्री, गायिका,शिक्षिका) उखीमठ(रुद्रप्रयाग)
कविता मैठाणी भट्ट
(कवियित्री, गायिका,शिक्षिका)
उखीमठ(रुद्रप्रयाग)
देश और दुनिया सहित स्थानीय खबरों के लिए जुड़े रहे दस्तक पहाड़ से।
खबर में दी गई जानकारी और सूचना से क्या आप संतुष्ट हैं? अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
भगवान शिव और पार्वती से केदारघाटी के स्नेह व संबंध की परंपरा ‘धनोळी’
दस्तक पहाड़ की से ब्रेकिंग न्यूज़:
भारत में सशक्त मीडिया सेंटर व निष्पक्ष पत्रकारिता को समाज में स्थापित करना हमारे वेब मीडिया न्यूज़ चैनल का विशेष लक्ष्य है। खबरों के क्षेत्र में नई क्रांति लाने के साथ-साथ असहायों व जरूरतमंदों का भी सभी स्तरों पर मदद करना, उनको सामाजिक सुरक्षा देना भी हमारे उद्देश्यों की प्रमुख प्राथमिकताओं में मुख्य रूप से शामिल है। ताकि सर्व जन हिताय और सर्व जन सुखाय की संकल्पना को साकार किया जा सके।
कविता मैठाणी भट्ट / ऊखीमठ
केदारघाटी में देर सायं महाशिवरात्रि (शिव पार्वती का विवाह दिवस) पूजन पर घरों के बाहर पंय्यां की टहनियों और बुरांश के फूल से सजी धनोळी लगाई गई। साथ ही
महादेव पार्वती के प्रतीकों को रात्रि भर पूजा गया। आज इन प्रतीकों को विधिवत पूजा के बाद विसर्जित कर दिया जाएगा।
भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती से केदारघाटी का गहरा लगाव और विशेष संबंध रहा है। यहां शिव पार्वती को ईश्वर कम और अपने परिवार का सदस्य अधिक समझा जाता है।
बचपन से देखती आयी हूं कितने सहज, सरल ,भोलेपन से बाबा केदार , मध्यमहेश्वर ,तुंगनाथ से केदारघाटी वासी अपने दुख दर्द परेशानियां साझा करते हैं। शिकायत करते
हैं । ये सब तो छोड़िये,डांटते भी हैं। महादेव पार्वती से केदारघाटी के इसी खूबसूरत संबंध को दर्शाती एक अनूठी परंपरा है धनोळी पूजन।
[caption id="attachment_25625" align="alignleft" width="692"] धनोळी लगाते हुए[/caption]
महा शिवरात्रि (शिव पार्वती का विवाह दिवस) की शाम को सभी घरों में पंय्यां की टहनियों से एक डोली बनाकर इस पर बुरांश के फूल लगाये जाते हैं। इस डोली को ही धनोळी
कहा जाता है। मिट्टी से शिव , पार्वती और गणेश बनाये जाते हैं। उन पर जौ के बीज चिपकाये जाते हैं । मरछा के लंय्यां और भूने हुए भट्ट , धूप दीप से मिट्टी से बनाये
गये शिव, पार्वती ,गणेश और धनोळी की पूजा करके,सबकी सुख समृद्धि की कामना करते हुए धनोळी को घर के बाहर टांग दिया जाता है। सुबह इन तीनों लिंग स्वरूपों को धारे
के मूलस्रोत( मुळ्याण) में विसर्जित किया जाता है।
भले ही पलायन की मार झेलते गांवों में अब बहुत कम लोग ही रह गये हैं किंतु भगवान शिव और पार्वती से केदारघाटी के स्नेह व संबंध को दर्शाती यह परंपरा आज भी
गांवों में जीवित है।
[caption id="attachment_25626" align="alignleft" width="848"] कविता मैठाणी भट्ट(कवियित्री, गायिका,शिक्षिका)उखीमठ(रुद्रप्रयाग)[/caption]
कविता मैठाणी भट्ट
(कवियित्री, गायिका,शिक्षिका)
उखीमठ(रुद्रप्रयाग)