होलाष्टक फल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होता है और फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन पर समाप्त हो जाता है। उसके अगले ही दिन होली खेली जाती है। इस वर्ष होलाष्टक 10 मार्च से 18 मार्च तक लगेगा। फाल्गुन अष्टमी से होलिका दहन तक 8 दिनों तक होलाष्टक के दौरान मांगलिक और शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं। हालांकि देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए ये दिन बहुत श्रेष्ठ माने गए हैं। ज्योतिषियों के अनुसार होलाष्टक का प्रारंभ भी 10 मार्च को प्रात: 05ः34 बजे से होगा। जो आठ दिनों तक रहेंगे। ऐसे में सभी शुभ कार्य वर्जित हैं। होलाष्टक का समापन

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होलिका दहन या फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होता है। ऐसे में फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 17 मार्च दिन गुरुवार को दोपहर 01 बजकर 29 मिनट पर हो रहा है, जो अगले दिन 18 मार्च दिन शुक्रवार को दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक मान्य है। पूर्णिमा का चांद 17 को दिखेगा और देर रात होलिका दहन होगा, ऐसे में होलाष्ट का समापन 17 मार्च को हो जाएगा। हालांकि फाल्गुन पूर्णिमा का व्रत 18 मार्च को रखा जाएगा। क्यों लगत हैं होलाष्टक पुराणों में कहा गया है कि राजा हरिण्यकश्यप बेटे प्रहलाद को भगवान विष्णु की भक्ति से दूर करना चाहते थे। उन्होंने 8 दिन प्रहलाद को कठिन यातनाएं दी। इसके बाद आठवें दिन बहन होलिका के गोद में प्रहलाद को बैठाकर जलाने का प्रयास किया गया, लेकिन फिर भी भक्त प्रहलाद को कुछ नहीं हुआ। इन आठ दिनों में प्रहलाद के साथ जो हुआ, उसके कारण होलाष्टक लगते हैं। होलाष्टक में ये शुभ व मांगलिक कार्य कार्य हैं वर्जित हिंदुओं में सोलह संस्कार जन्म से लेकर मृत्यु तक किए जाते हैं। इनमें गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, संस्कार, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, केशांत, विवाह, अन्त्येष्टि शामिल हैं। हालोष्टक के समय मुंडन, नामकरण, उपनयन, सगाई, विवाह आदि जैसे संस्कार और गृह प्रवेश, नए मकान, वाहन आदि की खरीदारी आदि जैसे शुभ कार्य नहीं करते हैं. इस समय काल में नई नौकरी या नया बिजनेस भी प्रारंभ करने से बचा जाता है।