भाजपा-कांग्रेस प्रतिष्ठा दांव पर, आखिर कैसे बड़ी जीत की ओर बढ़ती दिख रही भाजपा
1 min read23/11/2024 5:58 am
हरीश गुसाईं / अगस्त्यमुनि
दस्तक पहाड न्यूज ब्यूरो। केदारनाथ उपचुनाव में मतदान के बाद अब सभी आम व खास, राजनीतिज्ञ विश्लेषक एवं प्रत्याशी, दल एवं निर्दल सभी जोड़ घटाना करते हुए जीत हार पर चर्चा कर रहे हैं। भाजपा एवं कांग्रेस जहां अपनी अपनी जीत के दावे कर रहे हैं वहीं निर्दलीय एवं उक्रांद अपनी अपनी वोटों का अन्दाज लगा रहे हैं। जबकि आम जन अपने कयासों से कभी किसी को जिता रहे हैं तो कभी किसी को। जिससे राजनैतिक दलों की धड़कने भी बढ़ रही हैं। अब यह तो शनिवार को मतगणना के बाद ही पता चलेगा कि किसको बाबा केदार का आशीर्वाद मिलता है और किसकी झोली खाली रहती है। परन्तु यह चुनाव जिस तरह से परवान चढ़ा और भाजपा व कांग्रेस ने जिस तरह से इसे लड़ा वह न तो पूर्व में कभी देखने को मिला था और न ही शायद कभी भविष्य में दिख पायेगा।
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यह चुनाव मुख्यतः भाजपा एवं कांग्रेस के बीच ही दिखा। हालांकि निर्दलीय त्रिभुवन चौहान ने इसे त्रिकोणीय बनाने की भरसक कोशिश की परन्तु वे मुख्यतः एक ही क्षेत्र में इसमें कामयाब होते दिख रहे हैं। भाजपा एवं कंाग्रेस ने शुरू से ही इस चुनाव को एक रणनीति के तहत लड़ा। भाजपा की प्रतिष्ठा इस चुनाव में दांव पर थी। बद्रीनाथ हारने के बाद उसके सामने केदारनाथ जीतना अति महत्वपूर्ण हो गया। वहीं कांग्रेस को खोने के लिए कुछ नहीं था परन्तु केदारनाथ की जीत उसे 2027 के आम चुनाव में संजीवनी देगी। इसीलिए दोनों दलों में केदारनाथ जीतने के लिए पूरा दम खम लगाया। अपने प्रदेश के सभी शीर्षस्थ नेताओं को चुनाव प्रचार में झोंका और चुनाव जीतने के लिए सभी हथकण्डे अपनाये। आरोप प्रत्यारोपों के साथ सवाल जबाब भी इस चुनाव में खूब देखने को मिला।
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अब बात करते हैं कि इस चुनाव में भाजपा एवं कांग्रेस का कौन सा दांव उन्हें चुनाव में लाभ पहुंचाता हुआ दिख रहा है और कैसे उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पहले बात करते हैं भाजपा की। बद्रीनाथ की हार से सहमी भाजपा ने इस चुनाव को तीतने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। चुनाव की घोषणा होने से पूर्व ही उनकी बूथ स्तर पर पूरी तैयारी हो चुकी थी। चूंकि पहाड़ों में महिला मतदाताओं की संख्या अधिक है और उनका मतदान प्रतिशत भी पुरूषों से अधिक रहता है। इसीलिए भाजपा ने इन्हीं महिला मतदाताओं की ताकत को पहचानते हुए इस पर खूब काम किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में सत्ता सम्भालने के बाद से ही महिलाओं के उत्थान एवं सशक्तीकरण की कई यषेजनाओं को लागू किया। जिसका पूरा लाभ भाजपा को कई चुनावों में मिल भी चुका है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जिनकी पूरी प्रतियठा इस चुनाव में दांव पर लगी है, उन्होंने चुनाव की घोषणा होने से पूर्व ही केदारनाथ विधान सभा में महिला सशक्तीकरण सम्मेलन का आयोजन कर इन वोटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने का कार्य किया। रही सही कसर मोदी जी के राशन एवं पेंशन ने पूरी की। केदारनाथ विधान सभा में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की भी अच्छी खासी संख्या को देखते हुए भाजपा ने उनको भी साधने का पूरा प्रयास किया। क्योंकि इसे कांग्रेस का परम्परागत वोटर माना जाता है। हालांकि पिछले कुछ चुनावों में उनका यह वोट बैंक खिसकता चला गया। भाजपा ने गम्भीरता से इस वोट बैंक में सेंधमारी की और उसे सफलता भी मिलती दिख रही है। कहीं न कहीं भाजपा को लगा कि बद्रीनाथ हारने का मुख्य कारण उनका मतदाता, मतदान करने घर से नहीं निकला। इसलिए केदारनाथ में यह गलती न हो इसके लिए उन्होंने संगठन के साथ ही मन्त्रियों एवं बड़े पदाधिकारियों की फौज को भाजपा के मतदाताओं को बूथ पर लाने के लिए गांव गांव में प्रवास कर इसकी तैयारी की और सफलता पाई।
कांग्रेस ने यह चुनाव एक अवसर की तरह लिया जो उन्हें 2027 के आम चुनावों में संजीवनी दे सकता है। इसलिए उन्होंने भी इस चुनाव को जीतने के लिए सब कुछ दांव पर लगाया। अपने प्रदेश स्तरीय सभी बड़े नेताओं को इस चुनाव में प्रचार के लिए लगाया। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सबसे अधिक समय चुनाव प्रचार को दिया तथा विधान सभा के सभी क्षेत्रों में नुक्कड़ सभायें कर कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाया। वहीं नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने छिटके अनुसूचित जाति के मतदाताओं को कांग्रेस की ओर लाने के लिए पूरा जोर लगाया। सभी बड़े नेताओं के साथ लगभग सभी विधायकों ने पूरे विधान सभा के गांवों में घूम कर कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने के लिए जनता को प्रेरित किया। इससे पुराने कांग्रेसियों को संजीवनी मिली और घर बैठ चुके ऐसे कांग्रेसी भी खुलकर प्रचार में दिखे, जो अब तक अपनी अनदेखी से नाराज होकर घर बैठ चुके थे। दमदार मुद्दों के साथ चुनाव में भाजपा को परेशान भी किया। ज्यों ज्यों चुनाव परवान चढ़ा मुकाबला रोचक हो गया। यहां तक कि कांग्रेस जीत की ओर बढ़ती नजर आने लगी। परन्तु अन्तिम दौर में कांग्रेस पिछड़ गई। महिला मतदाताओं पर कांग्रेस की पकड़ कमजोर थी ही, अन्तिम दौर में वे अनुसूचित जाति को मतदाताओं को भी नहीं समेट पाये। चुनाव प्रचार में बड़े नेताओं एवं विधायकों की पूरी फौज आने से स्थानीय कार्यकर्ता उन्हीें के साथ नुक्कड़ सभाओं तक ही सिमट गया। गांवों में घर घर जाकर मतदाताओं के साथ कनेक्ट होने का समय नहीं मिल पाया। जिसका खामियाजा उसे होता दिख रहा है। यही नहीं अपने पक्ष के मतदाताओं को बूथ तक लाने में कांग्रेस असफल दिख रही है। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस अन्तिम दौर में केवल इस भरोसे, कि जनता भाजपा से नाराज है और वह कांग्रेस को वोट देगी, बैठी रह गई। गुप्तकाशी के ऊपर का क्षेत्र जहां केदारनाथ एक मुद्दा था। यात्रा अव्यवस्था, अतिक्रमण के नाम पर स्थानीय युवाओं का रोजगार छीनना तथा केदार शिला प्रकरण के कारण जनता की नाराजगी दिख रही थी उसे भी निर्दलीय त्रिभुवन चौहान समेटते नजर आ रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस अन्तिम समय में संसाधनों की कमी एवं कमजोर रणनीति के कारण चुनाव में पिछड़ती दिख रही है।
निर्दलीय त्रिभुवन चौहान ने जनता की नाराजगी को खूब भुनाया लेकिन वह केवल एक क्षेत्र तक ही सीमित रह पाये। फिर भी वे भाजपा एवं कांग्रेस दोनों को ही नुकसान करते दिख रहे हैं। वहीं उक्रांद के आशुतोष भण्डारी भी कुछ खास करते नहीं दिख रहे हैं। हां यह अलग बात है कि चुनाव चिह्न गैस सिलेण्डर होने का उनको कुछ फायदा मिल जाय। क्योंकि गैस सिलेण्डर पिछले चुनावों में कुलदीप रावत का चुनाव चिह्न रहा है।
मजबूत संगठन, महिला मतदाताओं पर पकड़, अनुसूचित जाति के मतदाताओं पर सेंधमारी तथा अपने वोटरों को बूथ पर लाने में कामयाबी से भाजपा बड़ी जीत की ओर बढ़ती दिख रही है।
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