दस्तक पहाड न्यूज।।अगस्त्यमुनि।। केदार घाटी के सुप्रसिद्ध अगस्त्य ऋषि मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व पर अगस्त्येश्वर महादेव की भव्य पूजा अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के बताते हुए श्री अगस्त्य मंदिर आचार्य भूपेंद्र बेंजवाल बताते है कि भगवान अगस्त्य द्वारा ही इस धरा पर सर्वप्रथम शिवलिंग की स्थापना की गई थी इसीलिए पहले शिवलिंग को अगस्त्येश्वर कहा गया। यह स्थान भगवान अगस्त्य की तपोभूमि है जहाँ प्रतिदिन पूजाऐ सम्पादित होती है। इसी परिसर में भगवान शिव का अत्यंत मनोहारी स्वरूप अगस्त्येश्वर के रूप में विराजमान है। महाशिव रात्रि पर्व के पहले पहर में भगवान शिव का दिव्य भोग विग्रह भगवान अगस्त्य के गर्भ गृह से निकाल कर महादेव मंदिर लाया जाता है। जहाँ विधिवत पूजन के साथ विग्रह को शिवलिंग के ऊपर रखा जाता है। भगवान अगस्त्येश्वर के भोग विग्रह के यह

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दिव्य दर्शन अत्यंत शुभ और कल्याणकारी होते है। श्री अगस्त्य मंदिर मठाधीश योगेश बेंजवाल ने बताया की आज शिवरात्रि पर्व पर महादेव की विशेष पूजा अर्चना प्रातःकाल से प्रारंभ हो गई है बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन जलाभिषेक के लिए आ रहे है। आज रात्रि के प्रथम पहर से पूर्व महादेव का मुखारविंद शिवलिंग पर स्थापित किया जाएगा, जिसके पश्चात वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा और आरती की जाएगी। अधिक से अधिक श्रद्धालु इस दिव्य भव्य पूजन आरती को दर्शन करने सायंकाल को अवश्य मंदिर में आऐ। अगस्त्येश्वर महादेव का महात्म्य  स्कंदपुराण के अवंतिखण्ड में अगस्त्येश्वर महादेव का वर्णन मिलता है। इस मंदिर की कथा सुनाते हुए महादेवजी ने उमा से कहा था कि पूर्व में देवता असुरों से परास्त व निराश होकर इधर-उधर भटक रहे थे, तब उन्हें अगस्त्य दिखे। देवताओं की बात सुनकर अगस्त्य प्रलयाग्नि की तरह प्रज्वलित हो उठे जिससे दैत्य जलकर पाताल में गिर पड़े। दैत्य वध से अगस्त्य जी का तपबल क्षीण हो गया तब ब्रह्मा जी ने उन्हें महाकाल वन में शिवलिंग की स्थापना आराधना करने को कहते है। तदनंतर महर्षि अगस्त्य द्वारा प्रथम शिवलिंग की स्थापना हुई जो अगस्त्येश्वर नाम से सुप्रसिद्ध हुआ। इस अगस्त्येश्वर शिवलिंग के स्मरण मात्र से मुनष्य के करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके दर्शन मात्र से ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिल जाती है। उज्जैन महाकाल वन के अगस्त्येश्वर महादेव  उज्जैन महाकाल मंदिर के 84 महादेवों में अगस्त्येश्वर पहले महादेव है। अगस्त्य मुनि के नाम से अगस्त्येश्वर महादेव के रूप में प्रसिद्ध इस मंदिर से ही 84 महादेवों की यात्रा प्रारंभ होती है।अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर में समुद्रेश्वर भी विराजमान हैं। किसी भी शिवालय में शिव के वाहन के रुप में उनके गर्भगृह के द्वार पर नंदी प्रत्यक्ष रुप में रहते हैं लेकिन यही एक ऐसा देवालय है जहां पर नंदी का स्थान पर समुद्र देवता ने लिया है। समुद्रेश सहज ही अगस्त्य ऋषि के आगे नतमस्तक नहीं हुए, अपितु अगस्त्य ने अपने अद्भुत तेज के प्रभाव से समुद्र को पीना प्रारंभ कर दिया। तब समुद्रेश ने प्रार्थना किया कि हे भगवन मेरा अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। कृपया ऐसा न करें, मैं आपका शरणागत हूं। इस पर अगस्त्येश्वर महादेव के द्वार पर समुद्र देवता प्रतिष्ठित हुए। इसी परिसर में अगस्त्य ऋषि की धर्मपत्नी लोपामुद्रा दक्षिण दिशा में उत्तर की ओर मुंह करके विराजमान हैं। लोपामुद्रा अपने पति व्रत संयम, त्याग-तपस्या के कारण विख्यात हैं। देवालय के अंत परिसर में ही अगस्त्य ऋषि की आकर्षक मूर्ति भी विराजमान हैं। सम्पूर्ण उत्तर भारत में ऐसा अद्भुत देव विग्रह सिर्फ काशी के अगस्त्यकुंड में विराजमान है।