दस्तक पहाड़ न्यूज। रुद्रप्रयाग। रुद्रनाथ महोत्सव के अवसर पर गुलाबराय, रुद्रप्रयाग में आयोजित कलश गढ़वाली कवि सम्मेलन ने श्रोताओं को भावनाओं, लोकसंस्कृति और समसामयिक चिंताओं से सराबोर कर दिया। सम्मेलन में गढ़वाली भाषा के प्रतिष्ठित और उभरते कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से पहाड़ का दर्द, संघर्ष, हास्य-व्यंग्य और सामाजिक यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। कवि सम्मेलन का संयोजन ओम प्रकाश सेमवाल ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत मुरली दीवान की कविता “दुख मा सुख खोजणै ऋतु लैगे” से हुई, जिसने जीवन के संघर्ष में आशा

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की तलाश को भावुक अंदाज में सामने रखा। बीना बेंजवाल ने “कटी अब उकाळ भुला ब्वे का सौं” के माध्यम से पलायन और बदलते पहाड़ की पीड़ा को स्वर दिया। वहीं गिरीश सुन्दरियाल की रचना “बेट्यूं तैं मैत बुलौंद पूस” ने बेटी और मायके के रिश्तों की मार्मिक झलक पेश की। कवि ओम बधाणी ने “उच्चि डाँडी काँठ्यूं मा अटगणू च ह्यूंद” पढ़कर पहाड़ी जीवन के कठोर यथार्थ को जीवंत किया। मोहन वशिष्ठ की कविता “भुला अब ज्वानी कु बसंत पैटण बैठीगे” ने समय और उम्र के बदलाव पर गहरी संवेदना व्यक्त की। समसामयिक विषयों पर बृजेश रावत ने “भैजि जु सु आंदोलनों मा हर जगा सरीक रै” के माध्यम से सामाजिक आंदोलनों पर तीखा व्यंग्य किया। अश्विनी गौड़ की कविता “जनम पत्रि कट्ठा कैरि कैरी अलमरि पर चट्टा लगी” ने आधुनिक जीवनशैली पर सोचने को मजबूर किया। कार्यक्रम में कुसुम भट्ट ने “सरकार ब्वनी गुगल पे जी पे कैसलेस पे” सुनाकर डिजिटल युग की सच्चाई को हास्य-व्यंग्य के साथ प्रस्तुत किया, जबकि ओम प्रकाश सेमवाल ने “बेटि छौं ब्वारि छौं भारतै नारि छौ” के माध्यम से नारी सम्मान और सशक्तिकरण का संदेश दिया। कवि सम्मेलन के दौरान श्रोताओं ने तालियों और उत्साह के साथ कवियों का स्वागत किया। आयोजन ने यह साबित किया कि गढ़वाली भाषा और साहित्य आज भी जनमानस से गहराई से जुड़ा हुआ है। रुद्रनाथ महोत्सव के इस कवि सम्मेलन ने सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक मजबूत संदेश दिया।