वो बोतल नहीं, नस्लें निगल रहा है सफेद जहर….पहाड़ में तेजी से पांव पसारता नशे का नया रूप
1 min read02/01/2026 2:19 pm

नितिन सेमवाल / जोशीमठ।।
जोशीमठ की सर्द हवाओं के बीच, नरसिंह मंदिर , बद्रीनाथ की ओर जाने वाले रास्ते पर आज शोर तो था, लेकिन यह शोर किसी उत्सव का नहीं बल्कि एक ‘आंदोलन’ का था। चौराहे पर खड़े लोग जोर-जोर से नारे लगा रहे थे— “शराब का ठेका बंद करो, नगर को नशा मुक्त करो।” भीड़ का जोश चरम पर था। उसी भीड़ के किनारे, पत्थर की एक बेंच पर गांव के एक बुजुर्ग ‘दाज्यू’ चुपचाप बैठे अपनी धुंधली आंखों से उस मजमे को देख रहे थे। पास ही खड़ा एक युवक उत्साह में आकर बोला, “दाज्यू, आप भी आइए! आज इस शराब के ठेके को बंद करवा कर ही दम लेंगे, हमारी आने वाली पीढ़ी बर्बाद हो रही है।” दाज्यू ने एक लंबी सांस ली और बड़ी शांति से पूछा, “बेटा, ये आंदोलन किसको सुधारने के लिए है?”युवक तपाक से बोला, “बच्चों के लिए दाज्यू! हम नहीं चाहते हमारे बच्चे शराबी बनें।” दाज्यू मुस्कुराए, पर उस मुस्कुराहट में दर्द था। उन्होंने युवक का हाथ पकड़ा और पास की एक अंधेरी गली की ओर इशारा करते हुए कहा, “कभी उस दीवार के पीछे झांक कर देखा है? वहां तुम्हें कोई 15 साल का बच्चा शराब की बोतल लिए नहीं मिलेगा। क्योंकि शराब की गंध पकड़ी जाती है, शराब पीने वाला लड़खड़ाता है और घर में बाप के डर से वह बोतल को हाथ लगाने से पहले सौ बार सोचता है।”
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युवक कुछ बोलने ही वाला था कि दाज्यू ने उसे टोकते हुए आगे कहा, “असली डर शराब की उस बोतल से नहीं है जिसके खिलाफ तुम चिल्ला रहे हो। असली डर उस ‘सफेद पाउडर’ और ‘जहरीले इंजेक्शन’ से है जो इन दिनों दिल्ली-देहरादून की गाड़ियों में छिपकर हमारे पहाड़ों तक पहुंच रहा है। भीड़ की नारेबाजी के बीच दाज्यू की आवाज अब भारी होने लगी थी, “शराब पीने वाला तो फिर भी होश में रहता है, पर जो बच्चा आज ‘वाइटनर’ सूंघ रहा है, जो गंदे मोजों से नशा कर रहा है या जो अपनी नसों में वो जहरीली सुइयां चुभो रहा है, उसका होश तो कोसों दूर चला गया है। शराब तो कोई बड़ा अधिकारी या फौज का अफसर भी सलीके से पी लेता है, लेकिन ये ‘स्मैक’ और ‘सुल्फा’… ये सलीका नहीं सिखाते, ये सीधा कब्र खोदते हैं। दाज्यू की बात सुनकर युवक के हाथ में थमा बैनर थोड़ा झुक गया। दाज्यू ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “बेटा, अगर नई पीढ़ी को बचाना है तो इस शराब के ठेके को तो बंद होना ही चाहिए, लेकिन क्या हम उस ‘सफेद मौत’ के सौदागरों के खिलाफ भी उतना ही बड़ा आंदोलन करेंगे? हम शराब के पीछे पड़े हैं क्योंकि वह दिखती है, पर उस नशे का क्या जो चुपचाप हमारे 15 साल के मासूमों के फेफड़ों और दिमाग को चाट रहा है? आंदोलन की गूंज अभी भी जारी थी, पर युवक के दिमाग में अब एक नया सवाल कौंध रहा था। उसे समझ आ गया था कि लड़ाई सिर्फ एक दुकान के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस अदृश्य ‘जहर’ के खिलाफ है जो शहर की जड़ों को खोखला कर रहा है। दाज्यू उठकर चलने लगे और जाते-जाते बस इतना कह गए— “शराब तो सिर्फ एक बुराई है, पर ये सिंथेटिक नशा तो हमारे भविष्य की हत्या है। तय हमें करना है कि हमें सिर्फ ठेके बंद करने हैं या अपने बच्चों की सांसें बचानी हैं।”
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