दस्तक पहाड न्यूज अगस्त्यमुनि।। रुद्रप्रयाग जनपद की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिला है। भाजपा नगर मंडल अगस्त्यमुनि के पूर्व महामंत्री और सक्रिय व्यापारी राजकिशोर बिष्ट ने भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा देकर उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की सदस्यता ग्रहण कर ली है। उनके इस फैसले को जिले की स्थानीय राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राजकिशोर बिष्ट लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे हैं और विभिन्न सामाजिक एवं संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ निभा चुके हैं। उन्होंने भाजपा छोड़ने के पीछे प्रदेश में बिगड़ती कानून व्यवस्था, बढ़ते भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आम जनता से जुड़े मुद्दों की अनदेखी को प्रमुख कारण बताया। उनका कहना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए उन्होंने नई राजनीतिक दिशा चुनने का निर्णय लिया। बिष्ट ने पूर्व में जिला संयोजक बजरंग दल, सह सचिव व्यापार संघ अगस्त्यमुनि, कोषाध्यक्ष योग संगठन रुद्रप्रयाग तथा प्रदेश अध्यक्ष बेरोजगार संगठन जैसे पदों पर भी कार्य किया है। वे पंचायत चुनाव में भी सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं और जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ चुके हैं। यूकेडी में शामिल होने पर पार्टी पदाधिकारियों ने उनका स्वागत किया। केंद्रीय महामंत्री देवेंद्र चमोली, जिलाध्यक्ष मूरत सिंह त्रिगुणा, पूर्व अध्यक्ष बलवीर चौधरी, पूर्व ज्येष्ठ उप प्रमुख विष्णु कांत शुक्ला और आशुतोष भंडारी सहित कई नेताओं ने कहा कि राजकिशोर बिष्ट के जुड़ने से संगठन को मजबूती मिलेगी। नेताओं ने विश्वास जताया कि वे पार्टी की रीति-नीति को जन-जन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाएंगे। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा से जुड़े रहे एक पुराने पदाधिकारी का यूकेडी में जाना आगामी चुनावी समीकरणों पर भी असर डाल सकता है।
भाजपा–कांग्रेस से युवाओं का मोहभंग, उत्तराखंड क्रांति दल की सदस्यता में बढ़ोतरी : उत्तराखंड की राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। लंबे समय से प्रदेश की सत्ता पर बारी-बारी काबिज रहने वाली राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस से युवाओं का भरोसा धीरे-धीरे कम होता नजर आ रहा है। इसका सीधा फायदा क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) को मिल रहा है, जहां हाल के महीनों में युवाओं की सदस्यता तेजी से बढ़ी है। यूकेडी नेताओं का दावा है कि प्रदेश के विभिन्न जिलों—खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों—में बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे युवा पार्टी की विचारधारा से जुड़ रहे हैं। युवाओं का कहना है कि राज्य गठन के मूल मुद्दे—रोजगार, पलायन रोकना, स्थायी राजधानी, मजबूत पहाड़ी अर्थव्यवस्था—आज भी अधूरे हैं। राष्ट्रीय दलों पर आरोप है कि उन्होंने सत्ता तो संभाली, लेकिन राज्य आंदोलन की भावनाओं को जमीन पर उतारने में विफल रहे। यूकेडी पदाधिकारियों के अनुसार हाल ही में आयोजित सदस्यता अभियानों में कॉलेज छात्रों, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं और स्वरोजगार से जुड़े युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। पार्टी इसे “राज्यवादी सोच की वापसी” बता रही है। नेताओं का कहना है कि “युवा अब दिल्ली आधारित राजनीति के बजाय उत्तराखंड केंद्रित नीति चाहते हैं।” राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बेरोजगारी, संविदा भर्ती, पलायन और शिक्षा-स्वास्थ्य ढांचे की स्थिति युवाओं की सबसे बड़ी चिंताएं हैं। सोशल मीडिया के दौर में युवा अपने मुद्दों पर खुलकर आवाज उठा रहे हैं और पारंपरिक दलों से सवाल पूछ रहे हैं। ऐसे में क्षेत्रीय दलों को अपनी बात रखने का नया अवसर मिल रहा है। हालांकि भाजपा और कांग्रेस दोनों का कहना है कि उनके युवा मोर्चे सक्रिय हैं और सरकारें लगातार युवाओं के लिए योजनाएं चला रही हैं। फिर भी जमीनी स्तर पर असंतोष की फुसफुसाहट यह संकेत दे रही है कि आने वाले चुनावों में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यूकेडी के लिए यह मौका संगठन विस्तार का है, जबकि राष्ट्रीय दलों के लिए चेतावनी—अगर युवाओं के मुद्दों पर ठोस पहल नहीं हुई तो पहाड़ की राजनीति में समीकरण बदलते देर नहीं लगेगी।











