दस्तक पहाड न्यूज देहरादून।। राजधानी देहरादून से एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। वरिष्ठ पत्रकार ने सोशल मीडिया पर दून मेडिकल कॉलेज को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि करोड़ों के बजट और ‘स्मार्ट हेल्थकेयर’ के दावों के बीच अस्पताल में एक मामूली ऑपरेशन के लिए सर्जिकल धागा तक उपलब्ध नहीं था, जिसके कारण मरीज को खुद बाहर से खरीदकर लाना पड़ा।
दून मेडिकल कॉलेज में टांके लगाने वाला धागा तक नहीं
वरिष्ठ पत्रकार नवीन थलेड़ी ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर खुद की दास्तां बयान की है। पत्रकार ने लिखा कि वह शुक्रवार को एक छोटे ऑपरेशन के दौरान खुद इस स्थिति के गवाह बने। उनके अनुसार, ऑपरेशन के बाद टांके लगाने के लिए अस्पताल में धागा नहीं मिला और परिजनों को केमिस्ट की दुकान पर भेजा गया। उन्होंने इसे स्वास्थ्य विभाग की बड़ी विफलता बताते हुए कहा कि जब मरीज को बुनियादी सामग्री खुद खरीदनी पड़े तो सरकारी दावों की सच्चाई सामने आ जाती है।पत्रकार नवीन थलेड़ी ने फेसबुक पर पोस्ट कर लिखा ‘अफसोस धन सिंह के मेडिकल कॉलेज में एक धागे की हैसियत नहीं। वैसे, तो दून मेडिकल कॉलेज के गलियारों में ‘स्मार्ट हेल्थकेयर’ का ढोल इतना जोर से पीटा जाता है कि मरीज की कराह सुनाई ही नहीं देती। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की फौज और ‘स्मार्ट’ स्टाफ का भारी-भरकम तामझाम तो है, लेकिन उनकी काबिलियत को सिस्टम के खोखलेपन ने बंधक बना लिया है’। आलम यह है कि करोड़ों का बजट डकारने वाला यह सफेद हाथी एक ‘माइनर’ ऑपरेशन के लिए एक अदद सर्जिकल धागा तक मुहैया नहीं करा पा रहा। शुक्रवार को इस वाक्या का मैं खुद गवाह हूं, जो मैंने अपने एक छोटे से आपरेशन के दौरान महसूस किया। जब मरीज को टांके लगवाने के लिए केमिस्ट की दुकान पर दौड़ना पड़े, तो समझ लीजिए कि स्वास्थ्य महकमे के दावों का टांका बीच सड़क पर उधड़ चुका है’।
अब घाव वाई-फाई से भरे जाते हैं: पत्रकार
पत्रकार ने आगे लिखा कि ‘सरकारी अस्पताल के हिसाब से बिल ‘मेजर’ है पर नीयत ‘माइनर’ धागे जितनी तक की भी नहीं। शर्मनाक है कि कागजों पर बड़े-बड़े ख्वाब दिखाने वाले महकमे को। शायद, महकमे का ‘डिजिटल इंडिया’ इतना आधुनिक हो गया है कि अब घाव वाई-फाई से भरे जाते हैं, या फिर मान लिया है कि जनता अपनी फटी जेब की तरह अपना शरीर भी खुद ही सिल ले’।
वरिष्ठ पत्रकार नविन थलेड़ी ने सरकार पर तंज कस्ते आगे लिखते हैं कि ‘मीडिया में लफ्फाजी के गुब्बारे फुलाने वाले हुक्मरान जमीनी हकीकत के कांटों से बेखबर हैं। जनता दोहरा टैक्स दे, अस्पताल के चार्ज भी भरे और फिर सुई-धागा लेकर लाइन में भी लगे? यह ‘राम भरोसे’ मॉडल नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की नग्नता है’











