दस्तक पहाड न्यूज पिथौरागढ़। ग्रामीण डाक सेवक (GDS) भर्ती का परिणाम सामने आने के बाद सीमांत जिले में चयन प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। इस बार पिथौरागढ़ में GDS के 65 पदों में से 60 पदों पर चयन हुआ है और सामने आई जानकारी के मुताबिक सभी 60 चयनित अभ्यर्थी हरियाणा के मूल निवासी बताए जा रहे हैं। इनमें करीब 50 अभ्यर्थियों के हाईस्कूल में 100 प्रतिशत अंक होने की बात कही जा रही है।
ग्रामीण डाक सेवक भर्ती में चयन हाईस्कूल की मेरिट के आधार पर होता है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर हाईस्कूल की मेरिट में लगातार इतने अधिक अंक कैसे आ रहे हैं और क्या केवल अंकों के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में डाक सेवकों की नियुक्ति करना व्यावहारिक है? सबसे बड़ा सवाल भाषा और स्थानीय समझ को लेकर है। ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात होने वाले डाक सेवकों का सीधा संबंध गांवों के लोगों से होता है। उन्हें ग्रामीणों के साथ संवाद करना, डाक संबंधी सेवाएं समझाना और सरकारी कामकाज में स्थानीय लोगों की मदद करनी होती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि यदि किसी अभ्यर्थी ने हाईस्कूल में हिंदी सहित विषयों में शत-प्रतिशत अंक हासिल किए हैं, तो फिर हिंदी लिखने-पढ़ने में कठिनाई की शिकायतें क्यों सामने आती हैं? और जिस क्षेत्र में नियुक्ति हुई है, वहां की स्थानीय भाषा-बोली को समझना और बोलना तो दूर की बात है। पिथौरागढ़ में पूर्व में हरियाणा से चयनित ग्रामीण डाक सेवकों को हिंदी की कोचिंग दिए जाने की बात भी सामने आई थी। यदि यह स्थिति सही है तो यह मौजूदा चयन प्रणाली की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
परीक्षा नहीं, सिर्फ मेरिट—क्या यह व्यवस्था बदलनी चाहिए?
आज लगभग हर सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की जाती है। अभ्यर्थियों की योग्यता, सामान्य ज्ञान, भाषा और पद से संबंधित क्षमता को परीक्षा के माध्यम से परखा जाता है। लेकिन ग्रामीण डाक सेवक पद के लिए अभी भी हाईस्कूल मेरिट को ही मुख्य आधार बनाया जा रहा है।
यही व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है।
- क्या सिर्फ हाईस्कूल के अंकों के आधार पर किसी पहाड़ी गांव में डाक सेवक की नियुक्ति उचित है?
- क्या नियुक्ति वाले राज्य की भाषा और स्थानीय परिस्थितियों का ज्ञान चयन का हिस्सा नहीं होना चाहिए?
- क्या दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए भी स्थानीय भाषा की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए ?
स्थानीय युवाओं के लिए अवसर या सिर्फ मेरिट का खेल?
स्थानीय युवाओं का कहना है कि उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पहले ही सीमित हैं। ऐसे में यदि स्थानीय युवाओं को अवसर देने के बजाय बाहरी राज्यों के अभ्यर्थी केवल हाईस्कूल मेरिट के आधार पर बड़ी संख्या में चयनित होते हैं, तो स्वाभाविक रूप से उनमें निराशा पैदा होगी। रुद्रप्रयाग के जिलाध्यक्ष कुलदीप सिंह कण्डारी, पूर्व दायित्वधारी महेंद्र लुंठी और होटल एसोसिएशन अध्यक्ष राजेंद्र भट्ट ने भी इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि लगातार हरियाणा बोर्ड के अभ्यर्थी इतनी अधिक मेरिट के साथ चयनित हो रहे हैं, तो इसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
केंद्र सरकार से चयन प्रक्रिया में बदलाव की मांग
जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार और डाक विभाग ग्रामीण डाक सेवक भर्ती की मौजूदा चयन व्यवस्था की समीक्षा करें। चयन प्रक्रिया को केवल हाईस्कूल मेरिट तक सीमित रखने के बजाय प्रतियोगी परीक्षा आधारित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही एक विकल्प यह भी हो सकता है कि जिस राज्य में ग्रामीण डाक सेवक की नियुक्ति हो रही है, वहां की स्थानीय भाषा/बोली का ज्ञान अनिवार्य किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारी के लिए स्थानीय सामाजिक और भाषाई परिस्थितियों की समझ भी उसकी कार्यक्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सवाल हरियाणा के युवाओं के चयन का नहीं, बल्कि चयन की उस व्यवस्था का है जिसमें 100 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला अभ्यर्थी तो नौकरी पा जाता है, लेकिन जिस क्षेत्र में उसे काम करना है, वहां की भाषा और स्थानीय परिस्थितियों से उसका कोई परिचय नहीं होता। क्या अब समय नहीं आ गया कि GDS भर्ती की इस मेरिट व्यवस्था पर केंद्र सरकार नए सिरे से विचार करे?


उत्तराखंड में फिर से हरियाणा








