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केदारनाथ धाम के नए रावल होंगे शिवाचार्य शांतिलिंग (केदार लिंग) , महाशिवरात्रि पर ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में की जाएगी घोषणा

दस्तक पहाड न्यूज ऊखीमठ।। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ धाम को अपना 325वां रावल मिलने जा रहा है। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर 15 फरवरी को इसकी विधिवत घोषणा की जाएगी। वर्तमान रावल भीमाशंकर लिंग ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने 42 वर्षीय शिष्य शिवाचार्य शांतिलिंग (केदार लिंग) को उत्तराधिकारी घोषित किया है।70 वर्षीय रावल भीमाशंकर लिंग शीतकाल में कपाट बंद रहने के दौरान महाराष्ट्र के नांदेड स्थित अपने मठ में प्रवास कर रहे हैं। वहीं आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने लिखित रूप से स्वास्थ्य संबंधी कारण बताते हुए उत्तराधिकारी की घोषणा की। इस संबंध में आधिकारिक घोषणा महाशिवरात्रि पर ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में की जाएगी। इसी अवसर पर पंचांग गणना के आधार पर श्रीकेदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि और समय भी घोषित होगा। कार्यक्रम में पंचगाईं के हक-हकूकधारी और दस्तूरधारी ग्रामीण भी मौजूद रहेंगे।

स्वास्थ्य कारणों से उत्तराधिकार तय : वरिष्ठ पुजारी शिव शंकर लिंग ने बताया कि रावल भीमाशंकर लिंग स्वास्थ्य कारणों से पद की जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ हैं। परंपरा के अनुसार उन्होंने अपने शिष्य शिवाचार्य शांतिलिंग उर्फ केदार लिंग को उत्तराधिकारी घोषित किया है। ऊखीमठ के पूर्व प्रमुख लक्ष्मी प्रसाद भट्ट ने भी नांदेड में आयोजित उस कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति की पुष्टि की, जहां उत्तराधिकारी की घोषणा की गई।

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कपाट खुलने की तिथि भी होगी घोषित : महाशिवरात्रि पर पंचकेदार गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में आयोजित कार्यक्रम में पंचांग गणना के आधार पर केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि और समय घोषित किया जाएगा। इस मौके पर पारंपरिक अधिकारधारी समुदाय, पुजारी वर्ग और स्थानीय ग्रामीण मौजूद रहेंगे।

11,750 फीट ऊंचाई पर आस्था का केंद्र : समुद्र तल से लगभग 11,750 फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम सनातन आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह चारधाम यात्रा का मुख्य धाम होने के साथ भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल है। जून 2013 की आपदा के बाद यहां व्यापक पुनर्निर्माण कार्य हुए हैं और हाल के वर्षों में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ी है।

परंपरा और आस्था के सर्वोच्च संरक्षक : केदारनाथ धाम में रावल सर्वोच्च धार्मिक पद होता है। रावल अविवाहित होते हैं और कर्नाटक के वीरशैव संप्रदाय से संबंध रखते हैं। कपाट खुलने और बंद होने के समय उनकी उपस्थिति अनिवार्य होती है। कपाट खुलने की तिथि तय करने से लेकर पुजारियों को अचकन-पगड़ी पहनाने, छह माह की पूजा का संकल्प दिलाने और पंचकेदार गद्दीस्थल से डोली को धाम के लिए विदा करने की परंपरा रावल निभाते हैं।रावल केवल पुजारी नहीं बल्कि शास्त्रीय विधि-विधान, धार्मिक अनुशासन और सदियों पुरानी पूजा परंपरा के संरक्षक माने जाते हैं।

सदियों पुरानी रावल परंपरा : केदारनाथ धाम में रावल परंपरा अत्यंत प्राचीन है। अब तक 324 रावल हो चुके हैं और 325वें रावल की घोषणा होने जा रही है। परंपरा के अनुसार पहले रावल भुकुंड लिंग थे। गणेश लिंग दूसरे, शोम लिंग तीसरे, हर लिंग चौथे और वीर लिंग पांचवें रावल हुए। मनोहर लिंग 10वें, वर लिंग 20वें, सुर लिंग 30वें, धर्म लिंग 40वें, ध्वज लिंग 50वें और नागाहर लिंग 60वें रावल रहे। कलाधर लिंग 100वें, शूलधारी लिंग 200वें और देवदेव लिंग 300वें रावल रहे। वर्तमान में भीमाशंकर लिंग 324वें रावल हैं और अब शिवाचार्य केदार लिंग 325वें रावल के रूप में यह आध्यात्मिक दायित्व संभालेंगे।

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