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ज्योतिषपीठ के असली शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी माधवाश्रम, जानिए क्यों संत नगरी ऋषिकेश में जुट रहे हैं उनके शिष्य

दस्तक पहाड न्यूज रुद्रप्रयाग।। प्रयागराज में हाल ही में माघ स्नान के दौरान उत्पन्न हुए विवाद के बाद ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य पद को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। संत समाज के एक वर्ग ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की शंकराचार्य पद पर दावेदारी पर सवाल उठाए हैं और उन्हें ज्योतिषपीठ का वैध शंकराचार्य मानने से इनकार किया है। इस मुद्दे ने धार्मिक परंपरा, शास्त्रीय मर्यादा और संस्थागत मान्यता को लेकर व्यापक चर्चा छेड़ दी है। संबंधित संतों का कहना है कि मामला न्यायालय तक भी पहुँचा है और उनके अनुसार अदालत द्वारा उनके पट्टाभिषेक को लेकर रोक लगाए जाने की बात कही जा रही है, जिससे विवाद और गहरा गया है। हालांकि इस विषय पर आधिकारिक न्यायिक अभिलेखों और दूसरे पक्ष की विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।

यह पूरा विवाद ज्योतिर्मठ (ज्योतिषपीठ) के शंकराचार्य पद की वैध परंपरा को लेकर है। संक्षेप में क्रम इस प्रकार समझा जाता है: 1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य बनाकर पीठ का पुनर्जीवन हुआ। उनके 1953 में ब्रह्मलीन होने पर उनके नामित उत्तराधिकारी स्वामी शान्तानंद सरस्वती गद्दी पर बैठे, लेकिन उनकी पात्रता को लेकर मतभेद हुए। इसी दौरान स्वामी कृष्णबोधाश्रम को भी शंकराचार्य घोषित कर दिया गया, जिससे दो समानांतर परंपराएँ शुरू हो गईं। 1973 में कृष्णबोधाश्रम जी के ब्रह्मलीन होने के बाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य माना गया। बाद में वे द्वारका शारदा पीठ के भी शंकराचार्य बने। मठाम्नाय परंपरा के अनुसार एक संन्यासी एक समय में एक ही पीठ पर आसीन रह सकता है, इसलिए इसे लेकर गंभीर विवाद खड़ा हुआ। इसी पृष्ठभूमि में 1992–93 में स्वामी माधवाश्रम को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य अभिषिक्त किया गया। इस परंपरा के अनुसार आगे की वैध उत्तराधिकार रेखा उन्हीं से मानी जाती है। इस मत के अनुसार, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को केवल शारदा पीठ का वैध शंकराचार्य माना जाता है, ज्योतिषपीठ का नहीं। इसलिए इस दृष्टिकोण से ज्योतिषपीठ पर उनका दावा तथा उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का वर्तमान दावा भी वैध नहीं माना जाता। विवाद का मूल प्रश्न आज भी यही है — ज्योतिषपीठ की वास्तविक और शास्त्रसम्मत उत्तराधिकार परंपरा किस धारा से मानी जाए।

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ज्योतिषपीठ पर शास्त्रीय रूप से सन् 1992–93 में काशी विद्वत परिषद, धर्म महामंडल, रामराज्य परिषद, अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ तथा तत्कालीन पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निरंजन देवतीर्थ जी महाराज सहित विभिन्न धर्माचार्यों की सहमति से स्वामी माधवाश्रम जी महाराज को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य अभिषिक्त किया गया था। उनका दावा है कि यह निर्णय शास्त्रसम्मत विचार-विमर्श और परंपरागत धार्मिक प्रक्रियाओं के बाद लिया गया था। बाद में शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम द्वारा शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद को ज्योतिर्मठ में शास्त्रार्थ के लिए बुलाया गया, उनके द्वारा शास्त्रार्थ की चुनौति स्वीकार की गई लेकिन निश्चित तिथि पर स्वामी स्वरूपानंद शास्त्रार्थ के लिए नहीं पहुंचे। इस प्रकार शास्त्रार्थ में शामिल न होना भी पराजय स्वीकार करने जैसा था।

शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम का जन्म उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जनपद स्थित आदर्श संस्कृत ग्राम बेंजी गाँव में पं रविदत्त बेंजवाल के घर हुआ था। उत्तराखण्ड राज्य सरकार द्वारा हाल ही में बेंजी गाँव को आदर्श संस्कृत ग्राम घोषित किया गया है। माधवाश्रम परंपरा से जुड़े संत आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठाम्नाय महानुशासन का हवाला देते हुए कहते हैं कि एक व्यक्ति एक समय में केवल एक ही पीठ का शंकराचार्य रह सकता है तथा किसी अन्य पीठ के क्षेत्र में बिना अनुमति अधिकार नहीं जता सकता। उनका तर्क है कि इन प्रावधानों के आधार पर ज्योतिषपीठ की शंकराचार्य परंपरा स्वामी माधवाश्रम जी महाराज की धारा से ही वैध रूप से आगे बढ़ती है। स्वामी माधवाश्रम जी महाराज 20 अक्टूबर 2017 को ब्रह्मलीन हो गए थे। दूसरी ओर शारदा पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज का 2022 में देहावसान हुआ। इन दोनों प्रमुख संतों के ब्रह्मलीन होने के बाद उत्तराधिकार का प्रश्न फिर प्रमुखता से सामने आया है।

माधवाश्रम परंपरा के संतों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में ज्योतिषपीठ की गद्दी पर नए शंकराचार्य की नियुक्ति का शास्त्रीय अधिकार उनकी शिष्य परंपरा को ही होना चाहिए। वे यह भी कहते हैं कि उनकी परंपरा में दंडी संन्यास की विधिवत परंपरा जीवित है और उसी धारा के किसी दंडी स्वामी को गद्दी पर आसीन किया जाना शास्त्रसम्मत होगा। उनके अनुसार इससे मठाम्नाय व्यवस्था और परंपरागत मर्यादाओं की निरंतरता बनी रहेगी।

क्या कहते है कंकालेश्वर मठ पौड़ी के महंत अभयचेतनानंद – कंकालेश्वर मठ पौड़ी के महंत अभयचेतनानंद कहते है वर्तमान में ज्योतिर्ममठ शंकराचार्य को लेकर रही उठाकर पटाक के बीच एक आहत सनातनी के रूप में अपने दायित्व का निर्वहन करूं, तथा कंकालेश्वर मठ का अधिपति, और सवंत्१९५६ में ज्योतिर्ममठ के शंकराचार्य द्वारा कंकालेश्वर मठ पौड़ी को दिये अधिकार पत्र, जिसमें उन्होंने हमें ज्योतिर्ममठ ,पर पूर्ण हस्तक्षेप का अधिकार दिया था, ( प्रमाण फोटो प्रपत्र में आगे दिया जायेगा)वर्तमान में ज्योतिर्मठ की शंकराचार्य व्यवस्था सरासर झूठ और पाखण्ड के बल से अधिकृत की जा रही है,जिसे ऐतिहासिक रूप से समझना पड़ेगा।

इसी संदर्भ में संत नगरी ऋषिकेश में एक महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित बताई जा रही है, जिसमें ब्रह्मलीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी माधवाश्रम जी महाराज की शिष्य परंपरा से जुड़े संत, विद्वान और धर्माचार्य एकत्र होकर वर्तमान स्थिति पर विचार-विमर्श करेंगे। बैठक में शास्त्रीय आधार, परंपरागत अधिकार और आगे की धार्मिक प्रक्रिया को लेकर चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है।

दूसरी ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थक उन्हें ज्योतिषपीठ का विधिवत शंकराचार्य मानते हैं और उनका पक्ष भी संत समाज के एक हिस्से में प्रभाव रखता है। ऐसे में यह विवाद केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रहकर संस्थागत मान्यता, परंपरागत अधिकार और कानूनी पहलुओं से भी जुड़ता जा रहा है। धर्म विशेषज्ञों का कहना है कि शंकराचार्य पद सनातन परंपरा में सर्वोच्च आध्यात्मिक गरिमा का प्रतीक है और ऐसे विवादों का समाधान संवाद, शास्त्रीय स्पष्टता और व्यापक संत सहमति से ही संभव है। श्रद्धालुओं के बीच भी यह चर्चा है कि विभिन्न दावों और प्रतिदावों के बीच परंपरा की मूल भावना और आध्यात्मिक एकता बनी रहनी चाहिए। फिलहाल ज्योतिषपीठ को लेकर स्थिति बहस और प्रतीक्षा की है, जहाँ अलग-अलग पक्ष अपने-अपने ऐतिहासिक, शास्त्रीय और परंपरागत आधार प्रस्तुत कर रहे हैं। आने वाले समय में धार्मिक संस्थाओं, संत समाज और न्यायिक प्रक्रियाओं की दिशा इस विवाद के भविष्य को तय कर सकती है।

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