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कंडारा के युवा दीपराज ने दिखाया पलायन को आईना, बदलती डेमोग्राफी और बढ़ती चुनौतियों के बीच गाँव बचाओ का संकल्प

दीपक बेंजवाल। दस्तक पहाड़ न्यूज।। जहां एक ओर पहाड़ से रोज़गार की तलाश में युवाओं का लगातार पलायन हो रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ युवा ऐसे भी हैं जो अपने गांव में रहकर ही आत्मनिर्भर बनने की मिसाल कायम कर रहे हैं। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी सामने आई है रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि विकासखंड अंतर्गत कंडारा गांव से। कंडारा गांव के युवा दीपराज ने अपने ही गांव में नाई (हेयर कटिंग) की नई दुकान “गढ़वाली सैलून”  खोलकर न सिर्फ़ स्वरोज़गार की दिशा में कदम बढ़ाया है, बल्कि गांव के अन्य युवाओं के लिए भी एक सकारात्मक संदेश दिया है। दीपराज की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब पहाड़ों में लगातार खाली होते गांव, बंद होते घर और बढ़ता पलायन एक बड़ी सामाजिक चुनौती बन चुका है।
पलायन, डेमोग्राफी और बढ़ती चुनौतियां : पिछले कुछ वर्षों में छोटे-छोटे रोजगार के नाम पर पहाड़ी क्षेत्रों में बाहरी लोगों की बसावट तेजी से बढ़ी है। इससे जहां सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ा है, वहीं गांवों की डेमोग्राफी में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। कई सुदूरवर्ती और आंशिक रूप से खाली गांवों में चोरी और अन्य असामाजिक घटनाओं की आशंका भी बढ़ी है। ऐसे में यदि गांव के युवा अपने गांव में ही रहकर काम करें, तो न केवल स्थानीय रोज़गार के अवसर पैदा होते हैं, बल्कि परिवार और गांव के लिए एक सुरक्षित वातावरण भी बनता है।
आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम : दीपराज का मानना है कि छोटे-छोटे स्थानीय काम भी गांव की अर्थव्यवस्था को मज़बूत कर सकते हैं। उनकी दुकान से अब गांव के लोगों को छोटे कामों के लिए दूर कस्बों तक नहीं जाना पड़ता। इससे समय और पैसे की बचत हो रही है और गांव में ही सेवाएं उपलब्ध हो रही हैं।
पहाड़ के भविष्य के लिए ज़रूरी पहल : दीपराज की यह पहल दिखाती है कि यदि अवसर और इच्छाशक्ति हो, तो गांव में रहकर भी सम्मानजनक रोज़गार किया जा सकता है। यह उदाहरण पहाड़ के उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो मजबूरी में पलायन को ही एकमात्र विकल्प मान लेते हैं।
कंडारा गांव के दीपराज की यह छोटी-सी शुरुआत दरअसल पहाड़ के लिए एक बड़ा संदेश है—रोज़गार गांव में भी संभव है, बस ज़रूरत है हौसले और पहल की।

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