दीपक बेंजवाल।। दस्तक पहाड़ न्यूज।। छेनागाड़ क्षेत्र में आई विनाशकारी आपदा को आज एक वर्ष पूरा हो गया। आपदा में जान गंवाने वाले लोगों को क्षेत्रवासियों ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दिवंगत आत्माओं की शांति की प्रार्थना की। वहीं, आपदा के एक वर्ष बाद भी क्षेत्र में अपेक्षित पुनर्निर्माण और राहत कार्य नहीं होने का आरोप लगाते हुए ग्रामीणों ने सरकार और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आपदा के बाद सरकार की ओर से कई घोषणाएं की गई थीं, लेकिन एक साल बीत जाने के बावजूद धरातल पर अपेक्षित काम नजर नहीं आ रहा है। क्षेत्र में सड़क, पेयजल, बिजली और ग्रामीण संपर्क मार्गों की समस्या आज भी बनी हुई है। ग्रामीणों के अनुसार, आपदा के बाद खोले गए कई मार्गों पर स्थायी सुधार के बजाय महज वाहनों की आवाजाही शुरू करने भर की व्यवस्था की गई। कई गांवों में स्कूल जाने वाले रास्तों की स्थिति भी खराब बताई जा रही है। वहीं, कुछ परिवारों के पेयजल संकट से जूझने का भी दावा किया गया है।
विस्थापन को लेकर भी असंतोष : आपदा प्रभावित परिवारों के विस्थापन को लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी बताई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि आपदा के एक वर्ष बाद भी विस्थापन संबंधी प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। किस परिवार को विस्थापन के दायरे में रखा गया और किसे प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिया गया, इसे लेकर भी ग्रामीणों के बीच असंतोष है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दौरान क्षेत्र में स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण बनी रहती है। थोड़ी सी बारिश में गदेरे उफान पर आने से ग्रामीणों को रातभर भय के माहौल में रहना पड़ता है। उनका आरोप है कि वर्ष 2025 की आपदा के बाद भी वर्ष 2026 में कई बार ऐसे हालात पैदा हुए।
घोषित बजट को लेकर सवाल: आपदा प्रभावित क्षेत्र के लिए सरकार द्वारा की गई बड़ी घोषणाओं को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। ग्रामीणों ने आपदा प्रभावित क्षेत्र के लिए घोषित 1200 करोड़ रुपये और मयाली–गुप्तकाशी मोटर मार्ग के सुधारीकरण के लिए घोषित 80 करोड़ रुपये की प्रगति को लेकर सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि घोषणाओं के बावजूद यदि धरातल पर काम दिखाई नहीं देता तो सरकार को जनता के सामने यह बताना चाहिए कि स्वीकृत धनराशि का क्या हुआ और अब तक कितना काम पूरा किया गया है।
‘सरकार आती-जाती रहेगी, जनता की सुध कौन लेगा : आपदा के एक वर्ष पूरे होने पर क्षेत्रवासियों ने कहा कि सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन आपदा प्रभावित परिवारों को अपनी समस्याओं के साथ यहीं रहना है। ग्रामीणों ने सरकार से घोषणाओं को धरातल पर उतारने, स्थायी पुनर्वास सुनिश्चित करने तथा सड़क, बिजली, पानी और संपर्क मार्गों की समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर समाधान करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि आपदा के बाद राहत और पुनर्निर्माण केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी और सुरक्षित व्यवस्थाएं विकसित की जानी चाहिए।
पीएम मोदी ने की थी 1200 करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा : आपदा के बाद उत्तराखंड सरकार की ओर से 5,702.15 करोड़ रुपये के नुकसान का मेमोरेंडम तैयार कर केंद्र सरकार को भेजा गया था। इसी बीच उत्तराखंड दौरे पर आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 सितंबर को आपदा प्रभावित उत्तराखंड के लिए 1200 करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी। नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्र सरकार की टीम ने भी उत्तराखंड का दौरा किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने पोस्ट डिजास्टर नीड एसेसमेंट (PDNA) कराने का निर्णय लिया, ताकि उसके आधार पर केंद्र से घोषित आर्थिक सहायता की धनराशि जारी कराई जा सके। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनका आभार जताया था। प्रधानमंत्री ने आपदा में अनाथ हुए बच्चों के लिए पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना के तहत सहायता की घोषणा करने के साथ ही प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की थी। उन्होंने सड़कों, स्कूलों और अन्य ढांचागत पुनर्निर्माण में केंद्र की ओर से हरसंभव सहयोग का भरोसा भी दिलाया था। अब छेनागाड़ समेत आपदा प्रभावित क्षेत्रों के ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि घोषित 1200 करोड़ रुपये की सहायता में से उनके क्षेत्र में कितना धन आया और कितना खर्च हुआ? ग्रामीण सरकार से पैकेज के तहत स्वीकृत और खर्च की गई धनराशि का सार्वजनिक विवरण जारी करने की मांग कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री की सड़क घोषणा से जगी थी उम्मीद: आपदा की सबसे ज्यादा मार झेलने वाले क्षेत्रों में भौंर गांव भी शामिल था। आपदा में गांव के दो लोगों की भी जान चली गई थी। वहीं भौंर गांव को छेनागाड़ मुख्य बाजार से जोड़ने वाला संपर्क मार्ग पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था।आपदा के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और रुद्रप्रयाग विधायक जब भौंर गांव पहुंचे तो ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा और परेशानियों के बावजूद उनका स्वागत किया। ग्रामीणों ने अतिथियों को भोजन भी कराया।ग्रामीणों को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री के गांव पहुंचने के बाद उनकी वर्षों पुरानी सड़क की समस्या का स्थायी समाधान होगा। मुख्यमंत्री ने भौंर गांव के लिए सड़क निर्माण की घोषणा भी की थी। घोषणा के बाद ग्रामीणों में उम्मीद जगी कि अब गांव को जल्द सड़क सुविधा से जोड़ा जाएगा। लेकिन एक वर्ष बीतने के बाद ग्रामीण इस घोषणा के धरातलीय क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
एक साल बाद भी कई गांवों में अधूरे हैं पुनर्निर्माण कार्य, उठे सवाल: आपदा के एक वर्ष बाद ताल जामण, थपोनी, बगड़, रुंडला, कम्द, जंगरयाण, डुंगर भट्टवाड़ी, जौला, छेनागाड़ और भौंर समेत कई गांवों में स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है।ग्रामीणों का आरोप है कि पुनर्निर्माण कार्य बेहद धीमी गति से चल रहे हैं और कई जरूरी कार्य अब तक शुरू नहीं हुए हैं। तालजामण निवासी सुरेंद्र सिंह का कहना है कि गांव के संपर्क मार्ग आज भी पूरी तरह तैयार नहीं हो पाए हैं। ग्रामीण टूटे और जोखिम भरे रास्तों से आवाजाही करने को मजबूर हैं। उन्होंने सुरक्षा दीवार और बैरिकेडिंग का निर्माण नहीं होने की बात भी कही। वहीं आपदा संघर्ष समिति से जुड़े पूर्व प्रधान शिवानंद नौटियाल के अनुसार बड़ेथ और डुंगर गांवों में पेयजल व्यवस्था अभी भी प्रभावित है। आपदा में जलापूर्ति लाइनें और टैंक क्षतिग्रस्त हो गए थे, जिसके बाद से कई जगह टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति की जा रही है।
मार्च में हुआ था आमरण अनशन : राहत और पुनर्निर्माण कार्यों में देरी से नाराज स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने बीते 2 मार्च को अपनी मांगों को लेकर आमरण अनशन भी किया था। आंदोलन के दौरान जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर क्षतिग्रस्त सड़कों, पुलों, पेयजल योजनाओं, संचार सुविधाओं और पुनर्वास कार्यों को शीघ्र पूरा करने की मांग की गई थी। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की ओर से आश्वासन जरूर मिले, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकांश कार्य अभी भी अधूरे हैं। इसके चलते अब एक बार फिर प्रभावित ग्रामीण आंदोलन की तैयारी में जुट रहे हैं।
सीमा पर जवान, लेकिन घर असुरक्षित! जंगरयाण तोक में फिर बढ़ा खतरा, 10 परिवारों ने छोड़े घर; सैनिक परिवार की गुहार पर भी नहीं जागा प्रशासन
देशभर में सेना के जवानों के सम्मान और उनके त्याग की बातें होती हैं, लेकिन रुद्रप्रयाग जनपद के बसुकेदार क्षेत्र की ग्राम पंचायत तालजामण के जन्दरियाण तोक की तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यहां एक सैनिक परिवार सहित 10 परिवार लगातार भूस्खलन की चपेट में हैं, लेकिन एक साल बाद भी सुरक्षा के ठोस इंतजाम नहीं किए गए।लगातार हो रही बारिश के चलते जन्दरियाण तोक में फिर से भूस्खलन तेज हो गया है। पहाड़ी से लगातार मलबा और पत्थर गिर रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि 10 परिवार अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हैं।इन्हीं प्रभावित परिवारों में गढ़वाल राइफल्स में तैनात सैनिक आशीष राणा और जीतपाल सिंह राणा का परिवार भी शामिल है। दोनों भाई देश की सीमाओं पर तैनात हैं, जबकि गांव में उनकी 68 वर्षीय बुजुर्ग मां गौरा देवी, चाची और अन्य परिजन खतरे के बीच जीवन गुजार रहे हैं।इस बार के भूस्खलन में आशीष राणा की गौशाला पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है। रिहायशी मकान में दरारें पड़ चुकी हैं, मकान का आंगन और आसपास की जमीन खिसक गई है। स्थिति ऐसी है कि परिवार दिन में किसी तरह घर में रहता है, लेकिन बारिश होते ही दूसरे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हो जाता है।ग्रामीणों का कहना है कि पिछले वर्ष अगस्त में आई आपदा के दौरान भी जन्दरियाण तोक में भारी नुकसान हुआ था। उस समय प्रशासन और शासन की ओर से सुरक्षा दीवार निर्माण और अन्य सुरक्षात्मक कार्यों का आश्वासन दिया गया था, लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कार्य शुरू नहीं हुआ। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षा कार्य पूरे कर दिए गए होते तो इस बार नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता था।सैनिक आशीष राणा छुट्टी लेकर गांव पहुंचे। उन्होंने ग्राम प्रधान को स्थिति से अवगत कराया और रुद्रप्रयाग जिलाधिकारी के जनता दरबार में भी प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन आरोप है कि अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
बरसात में हर रात डर के साये में ग्रामीण : ग्रामीणों के मुताबिक बरसात का मौसम आज भी उनके लिए चुनौती बना हुआ है। थोड़ी सी बारिश के बाद गदेरे उफान पर आने और रास्तों के प्रभावित होने से लोगों में भय का माहौल बन जाता है। उनका कहना है कि वर्ष 2025 की आपदा के बाद वर्ष 2026 में भी कई बार ऐसे हालात बने, जिससे उन्हें भविष्य में किसी बड़ी घटना की आशंका बनी रहती है।अब आपदा को एक वर्ष पूरा होने के बाद प्रभावित क्षेत्र की निगाहें एक बार फिर सरकार और प्रशासन पर टिकी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आपदा की बरसी केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि एक साल में हुए पुनर्निर्माण कार्यों का हिसाब लेने का भी समय है।ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि घोषणाओं को जल्द धरातल पर उतारा जाए और छेनागाड़ तथा आसपास के आपदा प्रभावित गांवों में स्थायी पुनर्निर्माण, सुरक्षित संपर्क मार्ग, पेयजल, संचार और पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। एक साल बाद भी सवाल यही है—आपदा के जख्म कब भरेंगे और प्रभावित गांवों को उनका पुराना जीवन कब लौटेगा ?











