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Dastak Pahad Team

केदारनाथ के रास्तों से लेकर गंगा के मायके तक पर्यटकों ने छोड़ा हजारों टन कचरा, वन्यजीवों के पेट तक पहुंचा प्रदूषण

चारधाम यात्रा में 27 सितंबर तक करीब 798 टन कचरा एकत्र, केदारनाथ पैदल मार्ग पर ही 270 टन ठोस कचरा; हरिद्वार में कांवड़ मेले के दौरान करीब 7 हजार मीट्रिक टन कचरा


दस्तक पहाड न्यूज अगस्त्यमुनि।। उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थाटन राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। चारधाम यात्रा से लेकर हेमकुंड साहिब, हरिद्वार-ऋषिकेश, नैनीताल, मसूरी और अन्य पर्यटन स्थलों तक हर वर्ष लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। लेकिन पर्यटकों की बढ़ती संख्या के साथ पहाड़ों पर कचरे का बोझ भी लगातार बढ़ रहा है। स्थिति यह है कि केदारनाथ की पैदल यात्रा के रास्तों से लेकर गंगा के तट तक प्लास्टिक और ठोस कचरा पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में कचरे को एकत्र करना, उसे नीचे लाना, अलग-अलग करना और वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित करना मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल है। यही वजह है कि पर्यटन से मिलने वाले आर्थिक लाभ के साथ उसका पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ता जा रहा है।

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चारधाम में करीब 798 टन कचरा एकत्र

चारों धाम की नगर पंचायतों से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2026 की यात्रा शुरू होने से 27 सितंबर तक केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री से कुल मिलाकर करीब 798 टन कचरा एकत्र किया गया।इसमें अकेले बदरीनाथ में करीब 393 टन, केदारनाथ धाम क्षेत्र में करीब 32 टन, जबकि गौरीकुंड से केदारनाथ तक पैदल मार्ग से करीब 270 टन ठोस कचरा एकत्र किए जाने की जानकारी सामने आई है। गंगोत्री में करीब 98 टन और यमुनोत्री यात्रा क्षेत्र में करीब 4.85 टन प्लास्टिक कचरा एकत्र किया गया। ये आंकड़े केवल कचरे की मात्रा नहीं बताते, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन का पर्यावरणीय दबाव किस स्तर तक पहुंच रहा है।

बदरीनाथ में प्लास्टिक बोतलें बनीं बड़ी चुनौती

बदरीनाथ में इस यात्रा सीजन के दौरान करीब 393 टन कचरा एकत्र हुआ। इसमें लगभग 161 टन सूखा कचरा बताया गया है। कचरे की प्रोसेसिंग के दौरान करीब 24 टन प्लास्टिक अलग किया गया। इसमें पानी की प्लास्टिक बोतलों की संख्या प्रमुख रही। पहाड़ी धार्मिक स्थलों पर बड़ी संख्या में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक बोतलें यदि वापस नीचे नहीं लाई जातीं तो इनके रास्तों, नालों, नदी-नालों और प्राकृतिक क्षेत्रों में पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।केदारनाथ में कचरे की समस्या सिर्फ मंदिर क्षेत्र तक सीमित नहीं है। धाम नगर पंचायत क्षेत्र में करीब 32 टन सॉलिड वेस्ट एकत्र हुआ, जिसमें लगभग 20 टन प्लास्टिक कचरा बताया गया है। वहीं, गौरीकुंड से केदारनाथ तक करीब 16 किलोमीटर लंबे पैदल मार्ग पर लगभग 270 टन ठोस कचरा एकत्र किए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यात्रा मार्गों पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों की बढ़ती आवाजाही के साथ कचरा प्रबंधन कितना बड़ा चुनौतीपूर्ण काम बन चुका है।

गंगोत्री और यमुनोत्री भी अछूते नहीं

गंगोत्री में यात्रा सीजन के दौरान करीब 98 टन कचरा एकत्र किया गया। इसमें लगभग 22 टन प्लास्टिक को रिसाइकिल किए जाने और करीब ढाई टन खाद तैयार किए जाने की जानकारी दी गई है। यमुनोत्री यात्रा क्षेत्र में भी करीब 4.85 टन प्लास्टिक कचरा एकत्र कर निस्तारित किया गया।

पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे क्षेत्र हिमालयी जलधाराओं के बेहद संवेदनशील हिस्सों में आते हैं। यहां छोड़ा गया प्लास्टिक लंबे समय तक पर्यावरण में बना रह सकता है और धीरे-धीरे जल स्रोतों तक पहुंच सकता है।

हरिद्वार में कांवड़ मेले के बाद दिखा कचरे का पहाड़

पहाड़ों से लेकर मैदान तक स्थिति बहुत अलग नहीं है। हरिद्वार में कांवड़ मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही के बाद नगर निगम के सामने सफाई की बड़ी चुनौती सामने आती है। इस वर्ष कांवड़ मेले के दौरान करीब 7 हजार मीट्रिक टन कचरा एकत्र होने की जानकारी सामने आई। इसमें लगभग 4 से 4.5 हजार मीट्रिक टन अतिरिक्त कचरा कांवड़ यात्रा से जुड़ा बताया गया। घाटों पर ही करीब 4,500 मीट्रिक टन कचरा जमा होने की जानकारी दी गई। नगर निगम ने हरकी पैड़ी समेत प्रमुख घाटों पर सफाई के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों को तैनात किया। प्लास्टिक और कपड़े के कचरे को अलग कर प्रोसेसिंग प्लांट और एमआरएफ सेंटर तक भेजने की व्यवस्था की गई।

कचरे से गंगा और दूसरी नदियों को खतरा

समाजसेवी रामेश्वर गौड़ के मुताबिक, कचरे का सबसे खतरनाक हिस्सा वह है जो आंखों से दिखाई नहीं देता। प्लास्टिक धीरे-धीरे छोटे-छोटे कणों में टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल सकता है और पानी के साथ नदी तंत्र में प्रवेश कर सकता है। हरिद्वार के 2020 के बेसलाइन आकलन में गंगा किनारे और शहर के विभिन्न हिस्सों में प्लास्टिक लीकेज के हॉटस्पॉट सामने आए थे। नदी किनारों, नालों और खुले स्थानों पर प्लास्टिक जमा होने की समस्या भी दर्ज की गई थी।

उत्तराखंड की अलकनंदा नदी में मछलियों पर किए गए एक अध्ययन में भी माइक्रोप्लास्टिक पाए जाने की बात सामने आई थी। इससे स्पष्ट होता है कि पहाड़ों और मैदानी क्षेत्रों में छोड़ा गया प्लास्टिक अंततः नदी तंत्र का हिस्सा बन सकता है।

हिमालय और ग्लेशियर तक पहुंच रहा प्लास्टिक

उत्तराखंड के लिए सबसे गंभीर चिंता यह है कि प्लास्टिक कचरा अब ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। खुले में पड़ा प्लास्टिक धीरे-धीरे टूटकर छोटे कणों में बदल सकता है और इसका असर मिट्टी, जलस्रोतों तथा हिमालयी पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है। गोमुख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी समय-समय पर सेना और विभिन्न संस्थाओं की ओर से सफाई अभियान चलाकर कचरा नीचे लाया गया है।

वन्यजीवों के पेट में पहुंच रहा प्लास्टिक

कचरे का असर केवल इंसानों और नदियों तक सीमित नहीं है। जंगलों और वन क्षेत्रों के आसपास छोड़ा गया प्लास्टिक तथा भोजन का कचरा वन्यजीवों को मानव बस्तियों और कूड़ा स्थलों की ओर आकर्षित कर सकता है।वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की टीम के देहरादून के आशारोड़ी और मोहंड क्षेत्र में किए गए अध्ययन में हाथियों के मल में पॉलिथीन पाए जाने की जानकारी सामने आई थी।वहीं, वर्ष 2022 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की टीम द्वारा उत्तराखंड के विभिन्न वन प्रभागों से हाथियों और अन्य वन्यजीवों के नमूनों की जांच की गई थी। इसमें कुछ नमूनों में प्लास्टिक, एल्युमिनियम और एक नमूने में कांच के अंश पाए जाने की बात सामने आई थी।यह स्थिति बताती है कि इंसानों द्वारा छोड़ा गया कचरा अब वन्यजीवों के भोजन और जीवनचक्र तक पहुंच रहा है।

सरकार के सामने अब केवल सफाई नहीं, कचरा रोकना भी चुनौती

उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2026 में चारधाम यात्रा को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए कई योजनाओं की घोषणा की। इनमें प्लास्टिक बोतलों की जगह वाटर एटीएम और आरओ प्लांट, कचरा फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई, प्लास्टिक वेस्ट के लिए मनी-बैक व्यवस्था और ड्रोन से कचरे की निगरानी जैसे उपाय शामिल हैं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मुताबिक, सरकार और स्थानीय निकायों की ओर से सफाई, कचरा संग्रहण, सेग्रीगेशन, रिसाइक्लिंग और प्लास्टिक नियंत्रण के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। यात्रा के दौरान निगरानी और तकनीकी व्यवस्थाओं को भी मजबूत किया गया है।

सवाल अब यह कि कचरा उठेगा या पैदा होना भी रुकेगा?

उत्तराखंड में बढ़ता पर्यटन जहां अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है, वहीं कचरे का बढ़ता बोझ हिमालय, नदियों और जंगलों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।चारधाम यात्रा मार्गों से लेकर गंगा के घाटों और जंगलों तक जमा हो रहा प्लास्टिक यह सवाल खड़ा करता है कि क्या केवल सफाई अभियान चलाकर इस संकट का समाधान संभव है?जरूरत अब ऐसी व्यवस्था की है जिसमें कचरा पैदा होने से रोकने, पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपना कचरा वापस लाने, सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटन की वहन क्षमता तय करने पर जोर दिया जाए।क्योंकि पहाड़ों में छोड़ी गई एक प्लास्टिक बोतल सिर्फ एक कचरा नहीं है। वह नदी, जंगल, वन्यजीव और अंततः इंसानी जीवन तक पहुंचने वाला प्रदूषण बन सकती है।

शनिवार, 10 अक्तूबर 2026

आज का सुविचार

सच्चा ज्ञान केवल किताबों में नहीं, बल्कि अनुभव और आत्म-चिंतन में छिपा है। दूसरों की गलतियों से सीखें, अपनी गलतियों को स्वीकारें और निरंतर सुधार की प्रक्रिया में बने रहें, यही बुद्धिमानी है।

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