दीपक बेंजवाल।। दस्तक पहाड न्यूज रुद्रप्रयाग। जनपद मुख्यालय स्थित जिला चिकित्सालय रुद्रप्रयाग में बिजली गुल होने के दौरान मरीजों और तीमारदारों को अंधेरे का सामना करना पड़ा। हालात ऐसे रहे कि अस्पताल में रोशनी के लिए मोमबत्ती का सहारा लेना पड़ा। स्वास्थ्य जैसी जरूरी सेवा से जुड़े जिला अस्पताल में इस तरह की स्थिति ने व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जनपद मुख्यालय के जिला चिकित्सालय में ही मरीजों को अंधेरे में उपचार कराने की नौबत आ जाए तो जिले के दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति क्या होगी?
विडंबना देखिए—यही रुद्रप्रयाग जनपद मुख्यालय है, जहां जिले के तमाम आला अधिकारी बैठते हैं। यहीं स्वास्थ्य विभाग के जिला स्तरीय अधिकारी मौजूद हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष का कार्यालय भी यहीं है और क्षेत्रीय विधायक एवं मंत्री का कार्यालय व आवास भी जनपद मुख्यालय में ही है। इसके बावजूद जिला अस्पताल जैसी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्था में बिजली व्यवस्था का चरमराना और मरीजों का अंधेरे में इलाज होना कई सवाल खड़े करता है। रविवार को एक व्यक्ति अपने मरीज का हालचाल पूछने जिला चिकित्सालय पहुंचा तो अस्पताल परिसर में चारों तरफ अंधेरा पसरा हुआ दिखाई दिया। जानकारी लेने पर पता चला कि अस्पताल में करीब 7 घंटे से बिजली व्यवस्था बाधित थी। हैरानी की बात यह रही कि इतने लंबे समय तक बिजली गुल रहने के बावजूद अस्पताल में न तो इनवर्टर की समुचित व्यवस्था दिखाई दी और न ही कोई प्रभावी वैकल्पिक प्रकाश व्यवस्था। हालात ऐसे बने कि मरीजों और तीमारदारों को अंधेरे के बीच रहना पड़ा।अगर इसी दौरान किसी मरीज को अचानक ऑक्सीजन की जरूरत पड़ जाए, किसी गंभीर मरीज की हालत बिगड़ जाए या तत्काल कोई इंजेक्शन अथवा चिकित्सकीय प्रक्रिया करनी पड़े, तो ऐसी स्थिति में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी उपचार कैसे करेंगे? एक छोटा सा इंजेक्शन लगाने के लिए भी पर्याप्त रोशनी जरूरी होती है, फिर अंधेरे में अस्पताल की इमरजेंसी सेवाएं आखिर कैसे संचालित हो रही हैं?
यह केवल बिजली जाने का मामला नहीं है। सवाल यह है कि क्या जिला अस्पताल में आपातकालीन परिस्थितियों के लिए पर्याप्त बैकअप व्यवस्था मौजूद है? अगर नहीं है तो फिर किसी गंभीर मरीज की जान पर संकट आने की स्थिति में इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?


जब जिला मुख्यालय का अस्पताल








