दस्तक पहाड न्यूज अगस्त्यमुनि।। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 28 मार्च 2027 को समाप्त होना है। ऐसे में फरवरी-मार्च में संभावित चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। वहीं, उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद), अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक संगठन और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय निर्दलीय चेहरे भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की तैयारी में जुट गए हैं।साल 2022 में भाजपा ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। अब पार्टी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए संगठन को मजबूत करने और स्थानीय मुद्दों को चुनावी अभियान का केंद्र बनाने की तैयारी में है।
23 हारी सीटों पर भाजपा का फोकस: भाजपा ने 2022 में हारी 23 विधानसभा सीटों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। पार्टी इन क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने के साथ वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारियां तय करने की रणनीति पर काम कर रही है।सरकार की उपलब्धियां, विकास योजनाएं, डबल इंजन सरकार के काम, सेवा संकल्प और जन-जन की सरकार जैसे अभियानों को चुनावी संवाद का हिस्सा बनाने की तैयारी है। पार्टी संभावित उम्मीदवारों को लेकर आंतरिक सर्वे और फीडबैक के जरिए जिताऊ चेहरों की तलाश में भी जुटी है।हालांकि, लगातार दो कार्यकाल के बाद सत्ता विरोधी भावनाओं को लेकर विपक्ष के सवालों का सामना करना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी। ऐसे में सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ स्थानीय स्तर की नाराजगी को दूर करना पार्टी की रणनीति का अहम हिस्सा रहेगा।
कांग्रेस को सत्ता में वापसी की तलाश: कांग्रेस भी 2027 को लेकर संगठनात्मक तैयारियों में जुटी है। पार्टी विधानसभा क्षेत्रों में संगठन, संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों को लेकर फीडबैक जुटा रही है। बेरोजगारी, पलायन, भर्ती, महंगाई, सड़क और बुनियादी सुविधाओं के साथ स्थानीय जनसमस्याएं कांग्रेस के चुनावी अभियान का प्रमुख हिस्सा बन सकती हैं।कांग्रेस राष्ट्रीय नेतृत्व के बड़े नेताओं के उत्तराखंड दौरे की तैयारी भी कर रही है। पार्टी के भीतर यह उम्मीद है कि राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के दौरे से कार्यकर्ताओं में सक्रियता बढ़ेगी और चुनावी अभियान को गति मिलेगी।हालांकि, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता और टिकट वितरण के दौरान संभावित असंतोष को नियंत्रित करने की होगी।
उक्रांद फिर तलाश रहा राजनीतिक जमीन: भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले के बीच उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में है। राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला उक्रांद 2027 के विधानसभा चुनाव में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का दावा कर रहा है। पार्टी समान विचारधारा वाले क्षेत्रीय दलों को साथ लाने के विकल्प पर भी मंथन कर रही है।उक्रांद ने चुनावी रणनीति में मूल निवास, सशक्त भू-कानून, स्थानीय लोगों के अधिकार, रोजगार, पलायन और जल-जंगल-जमीन से जुड़े सवालों को प्रमुखता देने की बात कही है। पार्टी ने ‘स्वाभिमान संकल्प यात्रा’ सहित संगठनात्मक गतिविधियां भी शुरू की हैं।हाल के दिनों में क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश भी सामने आई है। देहरादून में आयोजित ‘मंथन 2027’ कार्यक्रम में कई क्षेत्रीय दलों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने संभावित राजनीतिक एकजुटता, साझा न्यूनतम कार्यक्रम और चुनावी रणनीति पर चर्चा की।उक्रांद के सामने हालांकि चुनौती यह होगी कि राज्य आंदोलन से जुड़ी अपनी ऐतिहासिक पहचान को विधानसभा सीटों पर प्रभावी राजनीतिक समर्थन में कितना बदला जा सके।
निर्दलीय भी बिगाड़ सकते हैं समीकरण: उत्तराखंड की राजनीति में निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले विधानसभा चुनाव में भी कुछ क्षेत्रों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने प्रमुख दलों के सामने चुनौती पेश की थी। 2027 में भी स्थानीय स्तर पर मजबूत जनाधार वाले नेता टिकट नहीं मिलने या पार्टी से अलग होने की स्थिति में निर्दलीय मैदान में उतर सकते हैं।खासकर उन विधानसभा क्षेत्रों में, जहां किसी स्थानीय नेता की व्यक्तिगत पकड़ मजबूत है, निर्दलीय उम्मीदवार मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे नेताओं के सामने चुनाव जीतने के साथ संगठन, संसाधन और व्यापक स्तर पर मतदाताओं तक पहुंच बनाने की चुनौती भी रहेगी।
छोटे दल और क्षेत्रीय मुद्दे भी रहेंगे चर्चा में: इस बार चुनावी बहस सिर्फ भाजपा और कांग्रेस तक सीमित रहने के बजाय क्षेत्रीय अस्मिता, मूल निवास, भू-कानून, परिसीमन, रोजगार, पलायन और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द भी घूम सकती है।यदि क्षेत्रीय दल एक साझा मंच बनाने में सफल होते हैं तो कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी मुकाबले की तस्वीर अलग हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव उम्मीदवारों, गठबंधन, सीटों के बंटवारे और चुनाव के समय बनने वाले स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करेगा।
टिकट के दावेदारों ने बढ़ाई सक्रियता : चुनाव की तारीखों की घोषणा में अभी समय है, लेकिन संभावित उम्मीदवारों ने अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा दी है। भाजपा और कांग्रेस के अलावा उक्रांद तथा अन्य दलों के संभावित प्रत्याशी भी जनसंपर्क, सामाजिक कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों के जरिए अपनी जमीन तैयार कर रहे हैं।ऐसे में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता की निरंतरता का सवाल नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय चेहरों के लिए कितना राजनीतिक स्थान बनता है।फिलहाल चुनाव आयोग की ओर से चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है। आने वाले महीनों में भाजपा, कांग्रेस, उक्रांद, अन्य क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय दावेदारों की गतिविधियां तेज होने के साथ चुनावी तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।


उत्तराखंड में 2027 की चुनावी








