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अपनी ही सरकार से व्यथित पूर्व बीकेटीसी अध्यक्ष अजेंद्र अजय: “ऐसी राजनीति में सन्यास ही विकल्प”

नीतियों से नाराज़गी, अंकिता भंडारी हत्याकांड और केदारनाथ सोना चोरी प्रकरण पर भी जताई पीड़ा


दस्तक पहाड़ न्यूज अगस्त्यमूनि।। देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर असंतोष की आवाज़ सुनाई दी है। अजेंद्र अजय, जो कभी श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष रह चुके हैं और लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे हैं, उन्होंने अपनी ही सरकार के राजनीतिक माहौल पर गंभीर सवाल उठाते हुए राजनीति से संन्यास लेने की बात कह दी है।

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बृहस्पतिवार को सोशल मीडिया पर लिखे एक भावुक पोस्ट में अजेंद्र अजय ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य देखकर उनका राजनीति से मोहभंग होता जा रहा है। उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि “तीसरा दशक उत्तराखंड का होगा”, लेकिन आज जो हालात दिखाई दे रहे हैं, उनकी कल्पना कार्यकर्ताओं और जनता ने नहीं की थी। अजेंद्र अजय ने अपने पोस्ट में कहा कि छात्र जीवन से ही राष्ट्रवाद और सनातन के प्रति उनकी गहरी आस्था रही है और इसी कारण उन्होंने कई आरोप भी झेले, लेकिन वे कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने लिखा कि व्यथा तब होती है जब गलत कार्य होते हुए भी हम मौन समर्थन की स्थिति में दिखाई पड़ते हैं। ऐसे हालात में राजनीतिक जीवन से संन्यास लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता। यह नाराज़गी अचानक नहीं मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि अजेंद्र अजय लंबे समय से सरकार की कुछ नीतियों और घटनाओं को लेकर असहज रहे हैं। खासकर अंकिता भंडारी हत्याकांड और केदारनाथ मंदिर से जुड़े सोना चोरी प्रकरण जैसे मामलों को लेकर उन्होंने समय-समय पर सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी नाराज़गी जताई है।

केदारघाटी के वरिष्ठ पत्रकार अनसूया प्रसाद मलासी का कहना है कि यह बयान केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं बल्कि उस असंतोष की झलक है जो भीतर-ही-भीतर कई लोगों में मौजूद है। उनके अनुसार, “कोई तो है जिसके मन की पीड़ा बाहर छलकी है, अन्यथा बड़े-छोटे सभी खून का घूँट पी रहे हैं।”

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अजेंद्र अजय का यह बयान सत्तारूढ़ दल की कथनी और करनी के बीच बढ़ते अंतर की ओर भी इशारा करता है। एक ओर पार्टी राष्ट्रवाद, पारदर्शिता और नैतिक राजनीति की बात करती है, वहीं दूसरी ओर कुछ मामलों में उठे सवालों पर चुप्पी या धीमी कार्रवाई ने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच असहजता पैदा की है। अब सवाल यह है कि क्या यह बयान केवल व्यक्तिगत पीड़ा है या फिर उत्तराखंड की राजनीति में अंदरूनी असंतोष का संकेत। फिलहाल केदारघाटी से उठी यह आवाज़ राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन चुकी है।

 

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