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उत्तराखंड में तबादला एक्ट के दुरुपयोग का आरोप, दुर्गम से बचने के लिए शिक्षिकाओं ने अपनाया ‘कागजी तलाक’ का रास्ता, बीमार माता-पिता और सास-ससुर की सेवा के लिए भी शपथ पत्र

दस्तक पहाड न्यूज देहरादून। उत्तराखंड में शिक्षकों के तबादलों को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि दुर्गम क्षेत्रों में लंबे समय से तैनात कुछ शिक्षिकाओं ने सुगम क्षेत्रों में मनचाही तैनाती पाने के लिए ‘कागजी तलाक’ का सहारा लिया। शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, ऐसे मामले हाल में हुए 1500 से अधिक शिक्षकों के तबादलों के दौरान सामने आए हैं। विभाग ने मामलों की जांच शुरू कर दी है।

दरअसल, उत्तराखंड में शिक्षकों और कर्मचारियों के तबादलों के लिए तबादला अधिनियम-2017 लागू है। इस साल अनुरोध के आधार पर विशेष श्रेणियों में तबादले किए गए। इनमें गंभीर बीमारी, दिव्यांगता, माता-पिता या सास-ससुर की गंभीर बीमारी, विधवा-विधुर तथा सक्षम न्यायालय से घोषित तलाकशुदा और परित्यक्ता कार्मिकों को भी प्रावधानों के तहत शामिल किया गया। बताया जा रहा है कि कुछ शिक्षिकाएं 18 से 20 साल तक दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देने के बावजूद सुगम क्षेत्र में तबादला नहीं करा पाईं। इसके बाद कुछ मामलों में पति से तलाक लेकर खुद को तलाकशुदा श्रेणी में दिखाकर तबादले का लाभ लेने की शिकायतें सामने आई हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि तलाक के बाद भी संबंधित पति अपनी शिक्षिका पत्नी को स्कूल छोड़ने पहुंच रहे हैं। विभागीय सूत्र इसे कथित ‘कागजी तलाक’ का संकेत मान रहे हैं।

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क्या तबादला एक्ट बना ‘जुगाड़’ का जरिया?

इस पूरे मामले ने तबादला व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर कई शिक्षक वर्षों से दुर्गम क्षेत्रों में सेवाएं दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विशेष श्रेणियों में मिलने वाले प्रावधानों का गलत इस्तेमाल होने की शिकायतें व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े करती हैं।हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि ‘कागजी तलाक’ के आरोप अभी विभागीय जांच के विषय हैं। किसी भी शिक्षक या शिक्षिका के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकता है।

विभाग ने दिए जांच और कार्रवाई के संकेत

शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक सामने आए मामलों की जांच की जा रही है। यदि दस्तावेजों या तथ्यों में अनियमितता अथवा नियमों का दुरुपयोग पाया जाता है तो संबंधित कार्मिकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।इस प्रकरण ने उत्तराखंड की तबादला नीति को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या दुर्गम क्षेत्रों में वर्षों तक सेवा करने वाले शिक्षकों के लिए तबादले की व्यवस्था इतनी कठिन हो गई है कि कुछ लोग नियमों के भीतर रास्ता निकालने के लिए वैवाहिक संबंध तक को कागजों में बदलने का सहारा लेने लगे हैं?

तलाक का सहारा लेकर सुगम क्षेत्र में तैनाती का आरोप: रिपोर्ट के मुताबिक, विभागीय सूत्रों ने दावा किया है कि कुछ शिक्षिकाओं ने तलाकशुदा श्रेणी का लाभ लेने के लिए पति से तलाक लिया और इसके आधार पर मनचाहे सुगम क्षेत्र में तबादला हासिल किया। मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब कथित तौर पर तलाक के बावजूद पति ही अपनी शिक्षिका पत्नी को विद्यालय छोड़ने पहुंच रहे हैं। ऐसे मामलों ने विभाग के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या तबादला नीति में दी गई रियायतों का वास्तविक जरूरतमंदों को लाभ मिल रहा है या कुछ लोग नियमों का रास्ता निकालकर इसका फायदा उठा रहे हैं।

बीमार माता-पिता और सास-ससुर की सेवा के लिए शपथ पत्र : वहीं, माता-पिता और सास-ससुर की बीमारी के आधार पर तबादला पाने वाली शिक्षिकाओं को अब शपथ पत्र देना होगा। इसमें उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि वे बीमार परिजनों की सेवा करेंगी। शर्तों का पालन नहीं करने पर तबादला निरस्त किए जाने की कार्रवाई की जा सकती है।

20-25 साल से सुगम क्षेत्र में तैनात शिक्षक भी सवालों के घेरे में: उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में जहां बड़ी संख्या में शिक्षक वर्षों तक दुर्गम क्षेत्रों में सेवाएं देते हैं, वहीं विभाग में ऐसे शिक्षकों की मौजूदगी भी चर्चा का विषय है, जिन्होंने पूरी सेवा सुगम क्षेत्रों में ही बिताई है। रिपोर्ट के अनुसार कई शिक्षक पिछले 20 से 25 वर्षों से देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल समेत मैदानी जिलों के सुगम क्षेत्रों में तैनात हैं। तबादला नीति का उद्देश्य वास्तविक जरूरतमंद शिक्षकों को राहत देना है, ऐसे में कथित फर्जी या कागजी आधार पर लाभ लेने के मामलों की निष्पक्ष जांच और सत्यापन जरूरी माना जा रहा है।

 

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