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वीरों देवल में आज होगा फरसा कौथीग, गर्भगृह से बाहर आएंगी मां चण्डिका

दस्तक पहाड न्यूज केदारघाटी। नंदाष्टमी पर्व के अवसर पर आज वीरों देवल गांव में मां चण्डिका का पारंपरिक फरसा कौथीग आयोजित होगा। इस अवसर पर मां चण्डिका के काष्ठ विग्रह स्वरूप फर्स को गर्भगृह से बाहर लाकर श्रद्धालुओं को दर्शन कराए जाएंगे। इस धार्मिक आयोजन को लेकर क्षेत्र में विशेष उत्साह है।

मां चण्डिका वीरों, देवल, संगूड़, नैणी, पोंडार, क्यार्क और बरसूड़ी सहित सात गांवों की आराध्य देवी हैं। नंदाष्टमी के अवसर पर इन गांवों के ग्रामीण बड़ी श्रद्धा के साथ मां चण्डिका की पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी नई उपज तथा ऋतुफल देवी को अर्पित करते हैं।

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मंदिर समिति के अध्यक्ष डाॅ. आशुतोष भण्डारी ने बताया कि फरसा कौथीग मां चण्डिका की प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा आयोजन है। उन्होंने कहा कि नंदाष्टमी पर फर्स को गर्भगृह से बाहर लाकर श्रद्धालुओं को दर्शन कराना वर्षों पुरानी परंपरा है। इस दौरान सातों गांवों के श्रद्धालु मां चण्डिका का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और नई फसल व ऋतुफल देवी को अर्पित करते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की परंपराएं क्षेत्र की लोक संस्कृति और धार्मिक विरासत को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मंदिर के ब्राह्मण विजय डिमरी ने बताया कि मां चण्डिका के काष्ठ विग्रह फरस को विशेष धार्मिक विधि-विधान के साथ गर्भगृह से बाहर लाया जाता है। उन्होंने बताया कि नंदाष्टमी पर होने वाला यह दर्शन श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। परंपरा के अनुसार फर्स को गर्भगृह से बाहर निकालने से पूर्व उसमें चावल के दाने भरे जाते हैं। उन्होंने बताया कि धार्मिक मान्यता में फर्स को मां पार्वती के सती स्वरूप का प्रतीक माना जाता है और इसका संबंध देवी के शरीरकोष अथवा पंजर से माना जाता है।

बताया जाता है कि पुराने समय में इस मंदिर में सात चण्डिकाओं के फर्स विराजमान होते थे। वर्तमान में यहां वीरों देवल और अरखुण्ड गांव की चण्डिकाओं के फर्स विराजमान हैं। प्रत्येक वर्ष नंदाष्टमी के अवसर पर इन फर्सों को गर्भगृह से बाहर निकालकर आम श्रद्धालुओं को दर्शन कराए जाते हैं। इस दौरान स्थानीय ग्रामीण मां चण्डिका को नये अनाज और ऋतुफल अर्पित करते हैं। यह परंपरा कृषि, प्रकृति और देवी आराधना के आपसी संबंध को भी दर्शाती है। केदारघाटी के फलासी चण्डिका मंदिर में भी नंदाष्टमी पर इसी प्रकार की परंपरा निभाई जाती है। यहां भी भगवती चण्डिका के काष्ठ विग्रह को आमजन के दर्शनार्थ गर्भगृह से बाहर लाया जाता है।

24 वर्ष में एक बार होता है विशेष बन्याथ अनुष्ठान

नंदाष्टमी के वार्षिक आयोजन के अलावा इन काष्ठ विग्रहों को 24 वर्ष के अंतराल पर बन्याथ के लिए बाहर निकाला जाता है। यह प्रक्रिया अत्यंत गुप्त और विशिष्ट अनुष्ठानिक परंपरा मानी जाती है। परंपरा के अनुसार गर्भगृह से फर्स को बाहर निकालने से पूर्व उसे चावल के दानों से भरने की धार्मिक प्रक्रिया पूरी की जाती है। फरसा कौथीग के अवसर पर वीरों देवल में सातों गांवों के श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। नंदाष्टमी के इस आयोजन के माध्यम से मां चण्डिका की प्राचीन परंपरा, लोक आस्था और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत एक बार फिर जीवंत होगी।

 

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